मित्र, मंत्र और मौन!

संदीप देव। 'मित्र' वह है जिसके मन के साथ हमारा तंत्र जुड़ा हो। 'मित्रता' शुद्ध मानसिक संबंध है। हमारे जीवन में 5 तरह के संबंध विकसित होते हैं- 1) रक्‍त का संबंध 2) मन का संबंध 3) हृदय का संबंध 4) अध्‍यात्मिक संबंध 5) अ-संबंध। रक्‍त के संबंध में हमारे माता-पिता और बंधु-बांधव आते हैं, मन का संबंध  मित्रता का संबंध है और हां शत्रुता के संबंध की शुरुआत भी मन से ही होता है। हृदय का संबंध प्रेम का संबंध हैा प्रेमी-प्रेमिका के बीच के रिश्‍ते का अंकुर हृदय में फूटता है, लेकिन यहां यह भी बता दूं कि प्रेम और प्‍यार में भी फर्क हैा प्रेम अर्थात परम होने की अवस्‍था का 'भान'(सिर्फ भान कह रहा हूं, परम होने की अवस्‍था नहीं) और प्‍यार मतलब 'प्‍यारा यार' । प्रिय और यार शब्‍द से संयुक्‍त होकर बना है 'प्‍यार'। वर्तमान समय में प्रेम का रिश्‍ता नगण्‍य हो गया है और केवल प्‍यार का रिश्‍ता बचा है, जिसकी जड़ में वासना निहित होती हैा वैसे प्रेम और प्‍यार को अगले किसी पोस्‍ट में विस्‍तार से समझाऊंगा।

 

हां तो, चौथा रिश्‍ता आध्‍यात्‍म का रिश्‍ता होता है और यह सीध आत्‍मा से जुड़ा हैा उच्‍चारण करो आप समझ जाओगे कि अध्‍यात्‍म में 'आत्‍मा' छुपा हैा वैसे तो आप गुरु-शिष्‍य के बीच के रिश्‍ते को आध्‍यात्मिक रिश्‍ता कहते हैं, लेकिन जिस के साथ भी आपकी आत्‍मा जुड़ जाए, वही रिश्‍ता आध्‍यात्मिक रिश्‍ता हो जाता हैा  लेकिन आध्‍यात्मिक रिश्‍ता भी दो के बीच होता है, परंतु जब इस रिश्‍ते से दो भी मिट जाता है तो उस रिश्‍ते का कोई नाम नहीं रह जाता। वह एक तरह से अ-संबंध हैा भारतीय मनीषियों ने ही इसे ही परम अवस्‍था कहा है, जहां सब छूट जाए । परमात्‍मा, प्रकृति, अस्तित्‍व के साथ एकाकार होना ही संबंध से परे होना है ।

अ-संबंध मतलब, न केवल सभी तरह के सांसारिक रिश्‍तों से मुक्ति, बल्कि स्‍वयं से भी मुक्‍त हो कर परम अस्तित्‍व में विलीन हो जाना। जैसे फूल की सुगंध अस्तित्‍व में विलीन हो जाती है, उसी तरह मानव भी अस्तित्‍व में समा जाता हैा यही रिश्‍ता परम रिश्‍ता है।

तो मैं कह रहा था कि 'मित्र' मन का रिश्‍ता है और आप देखिए हमारे प्रार्थना को 'मंत्र' नाम दिया गया हैा 'मंत्र' भी हमारे मन को अस्तित्‍व से एकाकार कर देता है यदि हम लयबद्ध रहे तो यह मंत्र हमारे हृदय पर आघात करते हुए हमारी आत्‍मा पर चोट करता है और आखिर में सिर्फ मौन रह जाता है । 'मित्र', 'मंत्र' और 'मौन' यह तीन 'एकाकार' होने की सीढ़ी है, जो लगातार निम्‍न से उच्‍च होता चला जाता है । मित्रता मानसिक होते हुए भी स्‍थूल है, मंत्र मानसिक होते हुए भी ध्‍यात्मिक है और मौन स्‍वयं अस्तित्‍व हो जाना हैा

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