भारत एक धर्मभीरू देश है जो कट्टरता को भी जायज ठहराता है!

संदीप देव। शार्ली हेब्‍दो के पत्रकारों व कार्टूनिस्‍टों की हत्‍या के बाद दुनिया भर के पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने जहां इस्‍लामी कटटरता को अपनी कलम से जबरदस्‍त जवाब दिया है, वहीं भारत दुनिया का अकेला मुल्‍क है जहां एक सुर में सारे छदम धर्मनिरपेक्षतावादी, बुद्धिजीवी, पत्रकार, इस्‍लामी धर्म गुरु 12 फ्रेंच पत्रकारों की मौत को जस्टिफाई करने में जुटे हैं। सीरिया, नाइजीरिया, इराक, ईरान, पाकिस्‍तान से भी गया बीता व्‍यवहार हमारे मुल्‍क के पत्रकारों व बुद्धिजवियों ने फ्रेंच पत्रकारों के साथ किया है।

कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर इस्‍लामी आतंकवाद को मासूम बता रहे हैं, सपा नेता अबू आजमी कह रहे हैं कि यदि अभिव्‍यक्ति के नाम पर ऐसे ही कलम चलता रहा तो आतंकी भी नहीं रुकेंगे, किरण बेदी टवीट कर रही हैं कि आप अपनी कलम से किसी को मत उकसाइए, भाजपा प्रवक्‍ता सुधांशु त्रिवेदी कह रहे हैं कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की सीमा तय होनी चाहिए, कई मौलाना कह रहे हैं कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर इस्‍लाम पर व्‍यंग्‍य की इजाजत नहीं दी जा सकती है, कांग्रेसी प्रवक्‍ता मीम अफजल कह रहे हैं कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की वकालत करने वाले इस देश को छोडकर चले जाएं, पत्रकार रवीश कुमार आस्‍था का मुददा उठाकर पत्रकारों की मौत को जायज ठहरा रहे हैं तो बसपा का पूर्व सांसद आतंकियों के लिए 51 करोड के ईनाम की घोषणा कर रहा है।

यह भारत है, जिसका संविधान तो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की वकालत करता है, लेकिन जिसका बुद्धिजीवी समाज खुद को इस्‍लामी मुल्‍क सउदी अरब से भी ज्‍यादा इस्‍लामी साबित करने के लिए होड़ कर रहा है। क्‍या भाजपा, क्‍या कांग्रेस, क्‍या धर्म गुरु, क्‍या पत्रकार और क्‍या बुद्धिजीवी-- सभी में होड़ मची है कि कौन कितना इस्‍लाम की कटटरता को सही ठहरा कर मरे हुए पत्रकारों व कार्टूनिस्‍टों को लानत भेजता है। मैं यहां दुनिया के अखबारों मे इस्‍लामी कटटरता को कलम व कार्टून से दिए गए जवाब को आपके समक्ष रख रहा हूं, प्‍लीज यदि सृजनात्‍मक हैं तो देखें और दिल से पूछें कि क्‍या वह रोया... और यदि कटटरता के पोषक हैं तो आप भी उन पत्रकारों की मौत को जायज ठहराएं, आखिर हमारा लोकतंत्रात्‍मक देश उनकी मौत को तो जायज ठहरा ही चुका है।

वैसे ताज्‍जुब है कि कि फिर भी आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता
आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन ताज्‍जुब है फ्रांस के 12 पत्रकार मजहब के नाम पर ही मारे गए हैं! ताज्‍जुब है फ्रांस के पत्रकारों की हत्‍या को तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग 'मजहब विशेष को पहुंची चोट' बता कर मजहब के नाम पर ही जस्‍टीफाई करने में जुटे हैं! ताज्‍जुब है फ्रेंच पत्रकारों की हत्‍या करने वाले आतंकियों को वहां से बहुत दूर भारत के उत्‍तरप्रदेश का एक पूर्व मंत्री याकूब कुरैशी मजहब के नाम पर ही 51 करोड रुपए का ईनाम देने की घोषणा करता है!

ताज्‍जुब है आईएसआई मजहबी राज्‍य की स्‍थापना के लिए ही दुनिया को नर्क बनाए हुए है! ताज्‍जुब है आईएसआई का प्रमुख बगदादी मजहबी खलीफा का पद स्‍थापित करने के लिए ही छोटे बच्‍चे, महिलाएं, पुरुष, पत्रकार-- सभी का गला काट रहा है! ताज्‍जुब है अलकायदा छठी शताब्‍दी का मध्‍ययुगीन तालिबानी मजहबी शासन की स्‍थापना ही दुनिया में करना चाहता है!

ताज्‍जुब है भारत की शांति को नेस्‍तनाबूत करने वाला पाकिस्‍तान मजहब के नाम पर ही बना है! ताज्‍जुब है बंग्‍लादेश में मजहब के नाम पर ही अल्‍पसंख्‍यकों का पूरी तरह से खात्‍मा कर दिया गया है! ताज्‍जुब है मजहब के नाम पर ही शरिया कानून की बहाली की मांग पूरी दुनिया में की जा रही है! ताज्‍जुब है मजहब के नाम पर ही भारत के संविधान में वर्णित समान नागरिक संहिता को लागू नहीं करने दिया जा रहा है!

ताज्‍जुब है मजहब के नाम पर ही जम्‍मू-कश्‍मीर में हिंदू मुख्‍यमंत्री नहीं बन सकता है! ताज्‍जुब है लोगों की हत्‍या करने वाला आतंकवादी मजहबी 'अल्‍ला-हो-अकबर' के नारे लगाता है! ताज्‍जुब है तसलीमा नसरीन और सलमान रुश्‍दी की हत्‍या का फतवा मजहब के नाम पर ही जारी किया जाता है! लेकिन फिर भी आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता......!!!

इसे कहते हैं साहस
इसे कहते हैं साहस, इसे कहते हैं वास्‍तविक अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता। आतंकी हमला होने के बावजूद फ्रांस की व्यंग्य मैगजीन चार्ली एब्दो ने आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए अपने नए एडिशन के कवर पेज पर मोहम्मद पैगंबर के कार्टून को छापने का फैसला किया है। यह मैगजीन 14 जनवरी को प्रकाशित होगी। क्‍या भारत में यह संभव है। यहां की मीडिया ने तो इस्‍लामी आस्‍था के नाम पर पत्रकारों की मौत को ही जस्टिफाई कर दिया था। यदि शार्ली एब्‍दो जैसा दोबारा दुस्‍साहस भारत में किया जाता तो तय मानिए इस पर सरकार ही प्रतिबंध लगा देती।

अब आप समझ जाओ कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाला भारत अपने नागरिकों को अधिक अधिकार देता है या भारत के मुकाबले कहीं छोटा देश फ्रांस। यह भी याद रख लीजिए कि भारत में अभिव्‍यक्ति की पूरी स्‍वतंत्रता नहीं है। यहां आपको 153 बी की धारा लगाकर किसी की भावनाएं भड़काने के आरोप में कभी भी उठाया जा सकता है जबकि फ्रांस में आप राष्‍ट्रपति से लेकर उनके अपने धर्म क्रिश्चिनिटी को जमकर कोस सकते हैं, लेकिन सरकार या न्‍यायालय आपको नहीं रोकेगी। भारत में तो जो जितनी हिंसा कर सकता है, जिसके पास वोटों की अधिक ताकत है, अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता उसके पक्ष में उतनी ही अधिक झुकी हुई है। वैसे बता दूं कि फ्रांस की राजधानी पेरिस के मैगजीन ‘चार्ली एब्दो’ पर आतंकी हमले के चार दिन बाद रविवार को जर्मनी के एक प्रमुख अखबार 'हैम्बरगर मॉर्गन पोस्ट' पर भी हमला हुआ है। जर्मनी के इस अखबार ने भी मैगजीन में छपे पैगंबर मोहम्मद के विवादित कार्टून को छापा था. ताजा हमला जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में हुआ है। इसके बावजूद फ्रांस का शार्ली एब्‍दो अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता को बचाने के लिए कृतसंकल्‍प है तो हमें उसके साहस को सलाम करना चाहिए।

भारत में इस्‍लाम की फिलोसॉफी
फ्रांस में पत्रकारों की हत्‍या के बाद भारत में टीवी डिबेट में सपा के नेता अबू आजमी ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा था कि कुरान में कहा गया है जहां मुस्लिम अल्‍पसंख्‍यक हों वहां वह उस देश का कानून मानें और जहां बहुसंख्‍यक हो वहां शरिया कानून लागू कराने के लिए दबाब बनाएं।

अब देखिए इस्‍लाम के केंद्र सऊदी अरब में शरिया कानून लागू है और वहां महिलाओं की स्थिति क्‍या है... क्‍या दुनिया भर में इसी तरह की महिलाओं की स्थिति की कल्‍पना इस्‍लाम कर रहा है और क्‍या पूरी दुनिया पर यही बर्बरता इस्‍लाम थोपना चाहता है..... कम से कम हमें-आपको भारत में संविधान को मजबूत करने के लिए प्रयास जरूर करना चाहिए।

देश के सबसे युवा व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 60 साल की बुजुर्ग तलाकशुदा महिला शाहबानो को मुआवजा देने के लिए दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलट कर मुस्लिमों के लिए शरिया कानून लागू कर ही दिया है। कहीं ऐसा न हो कि जहां-जहां मुस्लिम बहुसंख्‍यक हों, वहां-वहां वह अलग शरिया कानून की मांग करने लगे। इससे अच्‍छा है कि संविधान में उल्‍लेखित समान नागरिक संहिता को देश में लागू करने के लिए जनदबाव बनाया जाए। एक देश में एक समान कानून विकासपरक सोच है, लेकिन अफसोस भारत में यही बात प्रतिक्रियावादी सोच के रूप में प्रचारित की गई है।

हमारे देश की महिलाओं को सउदी अरब जैसा बर्बर कानून नहीं चाहिए। और हम डरे हुए इसलिए हैं कि इसी देश का और खुद के परिवार द्वारा सबसे आधुनिक कहा जाने वाला एक प्रधानमंत्री शरिया कानून लागू कर मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी नर्क बनाने का कदम पहले उठा चुका है। सउदी अरब में कानून द्वारा महिलाओं के साथ किए जा रहे अत्‍याचार को एक बार पढ़ लीजिए, रोंगटे खड़े हो जाते हैं...

सऊदी अरब में जिंदगी आसान नहीं है, खासकर महिलाओं के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। यहां महिलाओं की ड्राइविंग पर रोक है और रेप जैसे अपराध में आरोपी को सजा तभी मिल सकती है, जब उसके चार चश्मदीद हों। ब्लॉगर रैफी को सार्वजनिक तौर पर कोड़े मारे गए और वो 10 साल जेल की सजा काट रहा है। रैफी को सिर्फ एक ऑनलाइन फोरम चलाने पर इस्लाम के अपमान का दोषी बता दिया गया।

Web Title: CharlieHebdo.1

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