कानून के फंदे से हर बार निकलने में सफल रही तीस्‍ता सीतलवाड़!

संदीप देव। दिल से कह रहा हूं, तीस्‍ता सीतलवाड़ की भविष्‍य में होने वाली गिरफतारी न जाने कितने मीडिया हाउस, पत्रकारों, एनजीओकर्मी, वामपंथी बुद्धिजीवी, न्‍यायपालिका के कुछ धुरंधर और विदेशी फंडिंग देने वाले सरगनाओं के लिए 'डिस्‍प्रीन' का डोज साबित होगी। मैंने अपनी पुस्‍तक '' निशाने पर नरेंद्र मोदी: साजिश की कहानी-तथ्‍यों की जुबानी'' में इसकी पूरी पोल पटटी खोली थी। गुजरात दंगा से पूर्व इनके व उनके पति के एकाउंट में महज कुछ हजार रुपए थे और दंगा होने के बाद तो करोड़ों रुपए ऐसे बरसने लगे, जैसे मैडम ने पैसे का कोई पेड़ अपने आंगन में रोप लिया हो। सुप्रीम कोर्ट के एक जज (अब सेवानिवृत्‍त) आफताब आलम हर बार इन्‍हें गिरफतारी से बचाते थे और ये मैडम अपना हर केस उन्‍हीं के बेंच वाली अदालत में ले जाती थी। बाद में पता चला कि जज साहब की बेटी व तीस्‍ता सीतलवाड़ के एनजीओ को एक ही विदेशी एजेंसी फंडिंग करती है। भाई अरब और अमेरिका में जाकर ये पुरस्‍कार ले आती थीं। केजरीवाल वाले फोर्ड भाई साहब, तीस्‍ता मैडम के भी एकाउंट का ख्‍याल रखते थे!

पत्रकार राजदीप सरदेसाई और राहुल सिंह तीस्‍ता के साथ नरेंद्र मोदी के खिलाफ लूनावाला नरकंकाल मामले में नकली सबूत गढने वालों में शामिल थे तो तीस्‍ता को बचाने वाले पत्रकार व अब केजरीवाल की पार्टी के विद्धान नेता आशीष खेतान दनादन फर्जी स्टिंग तैयार करते थे। बेस्‍ट बेकरी केस की गवाह जाहिरा शेख को 18 लाख रुपए देकर खरीदना हो या फिर एक मुस्लिम महिला का हिंदुवादियों द्वारा गर्भ फाड़ने की झूठी घटना का प्रचार-- यह सब आशीष खेतान ने ही अपने कैमरे से किया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट व उसके द्वारा गठित एसआईटी ने झूठ बताया था। आज आशीष खेतान टीवी चैनल पर बैठकर अरविंद केजरीवाल की ओर से नेतागिरी झाड़ रहा है। भाई, तरक्‍की हो तो ऐसी...

तीस्‍ता सीतलवाड़ व सुप्रीम कोर्ट के एक जज के बीच सांठगांठ का पूरा सबूत

तीस्ता सीतलवाड़ को आज भी मिल गई राहत, अब 19 फरवरी तक नहीं होगी गिरफ्तारी। आप सोचिए, इस देश में विदेशी फंडेड एनजीओ गिरोह कितना मजबूत है कि वह कानून तक को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। मैं वर्तमान माननीय सुप्रीम कोर्ट पर सवाल नहीं उठा रहा हूं, लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्‍यायाधीश आफताब आलम का तीस्‍ता के साथ सांठगांठ का सबूत सामने आ चुका है, इस आधार पर कह रहा हूं कि न्‍यायपालिका तक को प्रभावित करने की ताकत विदेशी फंडेड एनजीओ करती रही है। एक बार तो तीस्‍ता के पक्ष में निर्णय देने के कारण अपने ही जस्टिस आफताब आलम के कारण सुप्रीम कोर्ट को माफी मांगनी पड़ी थी, इसलिए प्‍लीज सुप्रीम कोर्ट यह समझे कि मैं उस पर सवाल नहीं उठा रहा हूं। कहीं ऐसा न हो कि अदालती अवमानना के नाम पर मुझे गिरफतार करने का फरमान जारी कर दिया जाए, क्‍योंकि मैं तीस्‍ता व एक पूर्व न्‍यायाधीश के बीच सांठगांठ का सबूत रख रहा हूं और अदालत भी सबूतों से ही चलती है-

1) सबूत नंबर-1: तीस्‍ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी और मुकुल सिन्‍हा की अगुवाई वाली 'जनसंघर्ष मंच' की मांग पर तत्‍कालीन सुप्रीम कोर्ट के जज आफताब आलम ने नानावती कमीशन को आदेश जारी कर दिया था। उनके इस आदेश पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने माफी मांगी और इस आदेश को वापस लेते हुए कहा कि '' किसी भी जज को कोई भी फैसला सुनाते समय भारत के कानून व संविधान का पालन करना चाहिए। कोई भी न्‍यायिक आयोग (नानावती कमीशन) पूरी तरह से स्‍वतंत्र होता है। किसी भी आयोग को नोटिस भेजने की सत्‍ता सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। सुप्रीम कोर्ट अपनी गलती सुधारते हुए नोटिस वापस लेता है और सभी पक्षों से इस गलती के लिए खेद प्रकट करता है।''

अब सुप्रीम कोर्ट के ही एक जज की तीस्‍ता के कहने पर दिए गए फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट को माफी मांगनी पड़ी हो तो यह समझा जा सकता है कि विदेशी फंडेड एनजीओ देश में कहां तक घुसी पड़ी है।

2) सबूत नंबर-2: गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व व गुजरात के पूर्व लोकायुक्‍त जज एस.एम.सोनी ने तत्‍कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस.एच.कपाडि़या को 27 जून 2012 को एक पत्र लिखा था, जिसमें लिखा गया था कि '' सांप्रदायिक सोच रखने वाले न्‍यायाधीश आफताब आलम को गुजरात दंगे से जुड़े सीाी मुकदतों से अलग किया जाए।'' जस्टिस सोनी ने तक यह कहा कि मेरे इस पत्र को केवल पत्र नहीं, बल्कि एक जनहित याचिका मानते हुए आफताब आलम को तत्‍काल गुजरात से जुडे सभी मुकदमों से हटाया जाए। अब सोचिए जब एक जज ही सुप्रीम कोर्ट के एक जज को सांप्रदायिक सोच वाला बता रहा है तो उस जज की विश्‍वसनीयता कहां रह जाती है।

3) सबूत नंबर-3: तीस्‍ता के पूर्व सहयोगी रईस खान पठान द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दर्ज शिकायत के अनुसार, ''जस्टिस आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम 'पटना कलेक्टिव' नामक एनजीओ चलाती है। इस एनजीओ को नीदरलैंड की वही संस्‍था 'हिवोस' फंडिंग करती है, जो तीस्‍ता के एनजीओ 'सिटिजन फॉर जस्टिस एंड पीस(सीजेपी) को फंडिंग करती है।'' उन्‍होंने इस पत्र में आगे कहा, ''हिवोस ने नीदरलैंड की एक अन्‍य संस्‍था 'कॉस्‍मोपोलिस इंस्‍टीटयूट' के साथ मिलकर 'प्रमोटिंग प्‍लूरिज्‍म नॉलेज प्रोग्राम' नाम से शोध पत्रों की श्रृंखला प्रकाशित किया, जिसे खुद जस्टिस आफताब आलम ने लंदन के 'द आइडिया ऑफ सेक्‍युलरिज्‍म एंड सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया' शीर्षक से एक पेपर के रूप में प्रस्‍तुत किया।'' आप सोच कर देखिए, सुप्रीम कोर्ट के एक जज व उसके परिवार मे विदेशी फंडिंग पहुंचने का यह सीधा सबूत है।

4) सबूत नंबर-4: लूनावाला नरकंकाल मामले में कब्र में दबे लाश को निकाल कर नरेंद्र मोदी को फंसाने के लिए तीस्‍ता ने सबूत मिटाया। गुजरात पुलिस ने मामला दर्ज किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्‍कालीन जस्टिस आफताब आलम आग बबूला हो उठे और अपने आदेश में कहा कि '' यह शत प्रतिशत सामाजिक कार्यकर्ता तीस्‍ता को सरकार द्वारा परेशान करने का प्रयास है।''

क्‍या खेल था भाई एक एनजीओकर्मी को बचाने के लिए न्‍यायपालिका-मीडिया-विदेशी एजेंसी-वामपंथी बुद्धिजीवी- नौकरशाही- सभी आपसी गठजोड़ किए हुए थे। महारानी तीस्‍ता आज तक इसी कारण तो बची हुई है। देखते हैं, समय कब करवट लेता है... लेकिन कसम से दंगा पीडि़तों को इसने खून के आंसू रुलाए हैं, कोई मदद किसी को नहीं दिया है। करोड़ों की रकम ये इसका पति, इसकी बहन, बेटी-- सबने मिलकर डकार लिया और उन लोगों को भी दिया जो इसके लिए बाहर रहकर बैटिंग करते थे।

Web Title: Teesta Setalvad to remain free-1

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