अनुयायी नहीं, आलोचक बनें क्‍योंकि तटस्‍थता सिर्फ एक भ्रम है

संदीप देव। मेरा अपने सोशल मीडिया के मित्रों से अनुरोध है कि आप किसी के कार्यकर्ता/ अनुयायी की तरह बर्ताव न करें, बल्कि स्‍वतंत्र विचार रखें, जिसमें तथ्‍य भी हों और तर्क भी। मैं जो भी बात रखता हूं तथ्‍य और तर्क के साथ रखता हूं। इसलिए कभी एक तथ्‍य एक के पक्ष में जाता दिखता है तो कभी दूसरा तथ्‍य दूसरे के पक्ष में।

तर्क और तथ्‍य तटस्‍थ नहीं रहते। जब गीता जैसा ज्ञान देने वाले भगवान श्रीकृष्‍ण आपको तटस्‍थ नहीं दिख सकते तो आप ही बताइए, कोई तथ्‍य और तर्क किस तरह से तटस्‍थ दिख सकता है। सूर्य की रौशनी मरुस्‍थल के मनुष्‍य को बेचैन करती है और ठंढ़क वाले स्‍थल के मानव तन-मन को सुकून देती है। किरण तो वही है, लेकिन उसका प्रभाव दो अलग स्‍थान के लोगों पर दो अलग तरह से दृष्टिगोचर होता है। अत: उसकी तटस्‍थता भी कहां रह जाती है। तटस्‍थता सिर्फ एक भ्रम है।

जीवन विरोधाभासों से भरा है। सुबह की किरण जीवन में रोशनी लाती है तो उसी दिन शाम को ढलता सूर्य रात के गहरे अंधेरे भी ले आती है। जन्‍म लेते ही मौत की यात्रा शुरू हो जाती है। इसलिए यह मत सोचें कि कल मैंने जो कहा वह एक विचार/ व्‍यक्ति / पार्टी को फायदा पहुंचा रहा था और आज जो कह रहा हूं वह दूसरी विचारधारा/ व्‍यक्ति/ पार्टी को।

ऐसा केवल किसी पार्टी, संस्‍था या विचारधारा के अनुयायी या कार्यकर्ता ही सोच सकते हैं, स्‍वतंत्र विचारक नहीं। तथ्‍य और तर्क रखिए, क्‍योंकि निष्‍पक्ष तथ्‍य, प्राणवान तर्क और स्‍वस्‍थ्‍य आलोचना के बिना न मानवता का विकास हो सकता है, न प्रकृति का, न राष्‍ट्र का, न समाज का और न ही लोकतंत्र का। अपने अंदर एक आलोचक दृष्टि विकसित कीजिए, अनुयायी सदृश्‍य भेड़ दृष्टि के लिए दिमाग की जरूरत नहीं होती है।

ईश्‍वर ने मनुष्‍य को दिमाग और काम करने के लिए हाथ दिया जबकि जानवर से यही दो चीज छीन लिया, भले ही उसे ताकत बहुत दी हो। इसलिए अपने दिमाग का उपयोग करें और हाथ से कम करें, अनुयायी नहीं, आलोचक बनें...

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