डॉ कलाम के राष्‍ट्रपति बनने का वामपंथियों ने विरोध किया था और आज उनकी मृत्‍यु के बाद उनके प्रति घृणा भरे पोस्‍ट भी वामपंथी ही लिख रहे हैं!

संदीप देव। सन 2002 में जब डॉ. कलाम ने राष्‍ट्रपति पद के लिए नामांकन किया था तो उनका एक मात्र विरोध देश के वामपंथी पार्टियों ने किया था। आज जब डॉ. कलाम हमारे बीच नहीं हैं, तो उसी वामपंथी विचारधारा के कुछ सेक्यूलर प्रजाति के एनजीओनुमा कीड़े, उनके प्रति घृणा का इजहार सोशल मीडिया पर कर रहे हैं।

दरअसल डॉ. कलाम ने भारत राष्‍ट्र को मिसाइल और परमाणु शक्ति से लैस कर मजबूत बनाया और वामपंथियों को यह कभी से पसंद नहीं था। चीनी आक्रमणकारियों का बाहें फैलाकर स्‍वागत करने वाले वामपंथियों का पूरा विरोध 'राष्‍ट्र- राज्‍य' की अवधारणा से रहा है। वह पूरी दुनिया को लाल झंडे में लपेटना चाहते हैं और हर देश में डॉ. कलाम जैसे वैज्ञानिक वामपंथियों के मंशूबों पर पानी फेरते रहे हैं।

खुद को बहुत बड़ा दलित चिंतक कहने वाले और पूर्व में इंडिया टुडे के कार्यकारी संपादक रह चुके दिलीप मंडल ने अपने फेसबुक पर अपनी कुंठा निकाला, '' आप कहेंगे तो मैं यह भी मान लूंगा कि एपीजे अब्‍दुल कलाम ने मिसाइल, सेटेलाइट, रेलगाड़ी व हवाई जहाज का आविष्‍कार किया था। लेकिन यह तो मत कहिए कि उन्‍होंने वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को बढ़ावा दिया।''
उसने आगे लिखा, '' और लगे हाथों यह भी4तल4 बता दीजिए कि किसी आदमी के न रहने के बाद उसके कामकाज की समीक्षा करने का शुभ मुहूर्त कब होता है।''

फेसबुक पर वामपंथी कुमार सुंदरम लिखता है, "ओडीशा में वेदांता को मंज़ूरी देना. देश के लिए बेहद हानिकारक रिवर लिकिंग परियोजना, परमाणु बम जैसे विनाशकारी हथियारों को बढ़ावा देना, गुजरात दंगों पर चुप्पी साधना, हेडगेवार और संघ के दूसरे नेताओं के आगे सर झुकाना. अपने आकाओं के लिए डॉ. कलाम का बलिदान उन्हें महान बनाता है. श्रद्धांजलि.''

इसी तरह एक अन्‍य वामपंथी ललित शुक्ला ने लिखा है, "डॉ. कलाम को मेरी श्रद्धांजलि. आप मेरे लिए कभी प्रेरणा स्त्रोत नहीं रहे. परमाणु हथियार, परमाणु ऊर्जा, रिवर लिकिंग परियोजना और ओडीशा में वेदांता पर आपने हामी भरी. मैं गुजरात दंगों पर भी आपको चुप्पी को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाया. आप भारतीय फ़ासीवादियों के पोस्टर बॉय रहे हो. हालांकि मैं आपकी सरलता को सलाम करता हूं."

कुछ ऐसा ही हाल कांग्रेसियों का भी है। सन् 2004 में इसी वामपंथी पार्टियों की ताकत के बल पर सोनिया गांधी सत्‍ता में आयी थी। लेकिन कहा जाता है कि सोनिया के विदेशी मूल पर डॉ. सुब्रहमनियम स्‍वामी ने सवाल उठा दिया, जिसके कारण डॉ. कलाम ने इस पर मशविरा के लिए कुछ वक्‍त मांगा और सोनिया इससे खफा हो गयीं। कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी ने इसका बदला सन् 2007 में लिया और डॉ. कलाम को दूसरी बार राष्‍ट्रपति बनने से रोक दिया। और न केवल रोका, बल्कि कांग्रेसियों ने डॉ. कलाम को अपमानित करने की कोशिश भी की थी। आज जर्नादन द्विवेदी जैसे कांग्रेसी को शब्दों  को चबा-चबा कर डॉ. कलाम के लिए श्रद्धांजलि के शब्द बोलता देखकर लगा कि ये लोग कितने पाखंडी और दोगले हैं!

डॉ कलाम से मिलने की मेरी इच्‍छा जो अधूरी रह गयी!
मैंने अपनी आगामी पुस्‍तक 'स्‍वामी रामदेव: एक योगी-एक योद्धा' में डॉ. एपीजे अब्‍दुल कलाम के साथ भारत को सशक्‍त बनाने के लिए बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्‍ण की चर्चा करती तस्‍वीर लगायी थी, तब कभी सोचा भी नहीं था कि डॉ. कलाम इतनी जल्‍दी हमारे बीच से चले जाएंगे।

सोचा था, यह पुस्‍तक प्रकाशित होते ही, मैं डॉ. कलाम के पास जाकर उन्‍हें पुस्‍तक की एक प्रति भेंट करूंगा, लेकिन यह सपना, सपना ही रह गया। जीवन में मुझे बार-बार झटका लगा है, सोचता कुछ हूं और होता कुछ और है। इसी बिंदु पर लगता है कि नियति के आगे इंसान मजबूर है। अस्तित्‍व आपके लिए कुछ और सोचता है, भले ही आप अपने लिए कुछ भी सोचते रहें- होगा वही जो अस्तित्‍व चाहता है।


यह है वो फोटो जो मेरी पुस्‍तक का हिस्‍सा है। मेरे जीवन में यह एक ऐसी याद बनकर रह गया है, जो पुस्‍तक को गौरवान्वित तो करेगा, लेकिन कहीं न कहीं चुभता भी रहेगा कि डॉ. कलाम को मैं यह पुस्‍तक भेंट नहीं कर सका.....!

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