Aurangzeb‬ के लिए बेचैन आधुनिक 'सलातीन' (हरम की संतान) !

संदीपदेव‬। वामपंथी इतिहासकारों ने मुगलों की महानता साबित करने के लिए हम सभी से यह छुपाया कि मुगलों के हरम की पैदाइश अर्थात नाजायज संतानों को कहां और किस हालत में रखा जाता था। एक-एक मुगल बादशाह के हजार से दो हजार नाजायज औलाद हरम की रखैलों से पैदा होते थे। 'हरम' से ही 'हरामी' जैसा गाली बना है अर्थात हरम की औरतों से पैदा ऐसे संतान, जिन्‍हें बादशाह अपना नाम नहीं देता था। मुगलों के ये नाजायज औलाद 'सलातीन' कहलाते थे। विलियम डैलरिंपल ने अपनी मशहूर पुस्‍तक 'द लास्‍ट मुगल' में लिखा है कि आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के समय खास शाहजादों के अलावा किले में करीब दो हजार गरीब शाहजादे व शाहजादियां, जो बादशाहों के पोते, पड़पोते, नवासे या उनकी भी औलादें थीं। उन्‍हें किले की कोठरियों में गरीबी की हालत में रखा जाता था। कई तो एकदम से नग्‍न रहते थे।

यह मैं इसलिए लिख रहा हूं कि भारत पर शासन करने वाले तुर्कों, अफगानियों, मुगलों में से इतिहास में सिकंदर लोदी व मुगल औरंगजेब ही ऐसा शासक थे, जिन्‍होंने कटटर इस्‍लामी शरियत कानून को देश पर जबरदस्‍ती थोपने का प्रयास किया। गैर इस्‍लामी जनता को दोयम दर्जे का नागरिक समझा। आज जो लोग धर्मनिरपेक्षता को अपने हिसाब से परिभाषित करते रहे हैं, वह उस क्रूर कटटरपंथी, सांप्रदायिक और मजहबी शासक के पक्ष में विरोध प्रदर्शन से लेकर मोदी सरकार को घेरने तक की योजना पर काम कर रहे हैं। मुझे शक है, कहीं इनके खून में भी 'सलातीनों' का खून तो शामिल नहीं है!

दरअसल इनकी समस्‍या किसी भाजपा या मोदी सरकार से नहीं, इनकी समस्‍या हिंदुओं की जागरूकता से है। भारत विभाजन से लेकर आज तक इस्‍लामी कटटरता को पोषित करने के लिए यह हिंदुओं को सेक्‍यूलरिज्‍म रूपी धतूरे का बीज खिला रहे थे और वामपंथी बुद्धिजीवि व पत्रकार वर्ग इसमें इनके मददगार थे। लेकिन सोशल मीडिया के उभार और लोकसभा-2014 के परिणाम ने हिंदुओं को जागरूक किया है, जिसके बाद से इनके अंदर बेचैनी पनप रही है।

भारत के विभाजन का पहला दस्‍तावेज जिस शासक ने तैयार किया था, वो औरंगजेब था। यह पूरा दस्‍तावेज आपको शीघ्र ही प्रकाशित औरंगजेब विशेषांक पत्रिका में मैं आपको उपलब्‍ध कराऊंगा। अंग्रेजों के समय भारत के विभाजन का वैचारिक जनक मोहम्‍मद इकबाल का आदर्श भी औरंगजेब ही था। इसलिए भारत के और विभाजन को रोकने के लिए इस जागरूकता को अधिक से अधिक फैलाने की जरूरत है। मैं यही प्रयास कर रहा हूं।

याद रखिए, सोशल मीडिया में लाइक, शेयर और टीवी का बहस केवल एक दिन का खेल है। यह अदालत में सबूत और आपके लिए सही रिफ्रेंस भी नहीं बन सकता है। छपे हुए शब्‍दों की यह ताकत ही है, जिसके कारण वेद, उपनिषद, गीता, रामायण और महाभारत को विदेशी नष्‍ट नहीं कर सके। छपे शब्‍द की ताकत बहुत बड़ी होती है। इसे पहचानिए और इसे फैलाइए।

‪#‎SandeepDeo‬ ‪#‎TheTrueIndianHistory‬ Sandeep Kumar Deo

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