एनसीईआरटी की पुस्‍तकों में ‪Aurangzeb‬ को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए भरे झूठ पर एक नजर डालिए!

‪संदीपदेव‬। मैं ‪औरंगजेब‬ की असलियत आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं तो कुछ लोग हैं जो यह सवाल उठा रहे हैं कि आप औरंगजेब के पीछे क्‍यों पड़े हैं? अब ऐसे मूढ़मतियों को क्‍या जवाब दिया जाए? दरअसल यह गलती इनकी नहीं, उस एनसीईआरटी किताब की है, जिसे कांग्रेस शासन में वामपंथी इतिहासकारों ने लिखा है और जिसे पढ़ पढ कर ये मूढमति बने हुए हैं, लेकिन इन्‍हें गुमान है कि ये धर्मनिरपेक्ष हैं!

 

कक्षा-11 के लिए एनसीईआरटी की 'मध्‍यकालीन भारत' इतिहास पाठय पुस्‍तक में औरंगजेब की हर क्रूरता को न केवल हल्‍का किया गया है, बल्कि बिना स्रोत के, बिना दस्‍तावेज के दोष हिंदूओं पर मढ़ कर औरंगजेब को महान धर्मनिरपेक्ष साबित करने का प्रयास किया गया है। इस पुस्‍तक को लिखा है प्रो.सतीशचंद्र ने और हिंदी अनुवाद किया है- बिमल प्रसाद, मधु त्रिवेदी व जमालुद्दीन ने। किताब की वामपंथी व्‍याख्‍या देखिए:

1) कुछ दूसरे इतिहासकारों (नाम नहीं दिया गया है) के अनुसार, औरंगजेब पर नाहक दोषारोपण किया गया है। हिंदू औरंगजेब के पूर्ववर्ती शहंशाहों की शिथिलता के कारण गैर वफादार हो गए थे, जिससे मजबूर होकर आखिर उसे कड़े कदम उठाने पड़े और मुसलमानों का समर्थन प्राप्‍त करने की खास कोशिश करनी पड़ी, क्‍योंकि साम्राज्‍य अंतत: टिका हुआ तो उन्‍हीं(मुसलमान) के समर्थन पर था।

व्‍याख्‍या: लेखक शायद यह व्‍याख्‍या कर रहे हैं कि हिंदू शिथिल हो गए थे, इसलिए उनका धर्मातरण और उनका नरसंहार जरूरी था। उनके मंदिरों को ध्‍वंश करना जरूरी था और उनका कत्‍लेआम जरूरी था। जबकि सच्‍चाई यह दर्शाते हैं कि दारा से युद्ध में हिंदू राजा जय सिंह ने औरंगजेब के पक्ष में न केवल महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि दारा के मित्र जोधपुर नरेश जसवंत सिंह को भी दारा से अलग कर औरंगजेब के पक्ष में किया। यदि हिंदू शासक शिथिल होते तो दारा शिकोह हिंदुस्‍तान का शासक बनता, औरंगजेब नहीं।

2) औरंगजेब ने धर्मनिरपेक्ष फरमान जारी करने में कभी कोई संकोच नहीं किया।
व्‍याख्‍या: शायद वामपंथी लेखक यह कहना चाहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता के लिए गुरु तेगबहादुर और शिवाजी पुत्र संभा जी सबसे बड़े अवरोधक बन गए थे, जिसके कारण उनकी हत्‍या जरूरी थी और धार्मिक मंदिरों- काशी विश्‍वनाथ व मथुरा का केशवराय और राजपुताना का करीब 100 मंदिर धर्मनिरपेक्षता के लिए तोड़ना जरूरी था।

3) विश्‍वनाथ मंदिर व मथुरा के केशवराय मंदिर को तोड़े जाने के कुछ राजनीतिक प्रयोजन भी थे, वह मंदिरों को हानिकर विचार का केंद्र मानने लगा था, 1679 के बाद औरंगजेब का मंदिरों के विध्‍वंश का उत्‍साह कुछ ठंडा पड़ गया, अपनी मंदिर सबंधी नीति के मामले में औरंगजेब औपचारिक तौर पर शरा की मर्यादाओं के अधीन रहा, उसने हिंदू मंदिरों व मठों को दान दिए- वगैरह।

4) शरा के अनुसार मुस्लिम राज्‍य में गैर मुसलमानों के लिए जजिया अदा करना वाजिब था।

5) यद्यपि औरंगजेब लोगों को मुसलमान बनाना वाजिब मानता था, तथापि योजनाबद्ध रीति से या बड़े पैमाने पर लोगों को जबरन मुसलमान बनाने के साक्ष्‍य का अभाव है।

तात्‍पर्य यह कि कक्षा 11 का किशोर, जिसका मन कच्‍चा होता है-हमारे इतिहास की पुस्‍तकों के जरिए उसके दिमाग में झूठा इतिहास भरा जाता रहा है और यह आजादी के बाद से चल रहा है। यही किशोर आगे चलकर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाला अर्थात अधर्मी बनकर मार्क्‍स-मोहम्‍मद-मसीह के विचारों का समर्थक और इस नाते खुद को प्रगतिशील मानता रहा है। जबकि वास्‍तविकता में वह अपनी संस्‍कृति व इतिहास से महरूम एक मूर्ख भारतीय है बस!

रवीश कुमार, पुण्‍य प्रसून आदि यही इतिहास पढ़कर बड़े हुए हैं। देख लीजिए, इनके दिमाग में झूठ का कितना कचरा भरा पड़ा है। हकीकत तो यह है कि आज भी कलकत्‍ता, दिल्‍ली, बिकानेर आदि के अभिलेखागार में औरंगजेब के वो फरमान ज्‍यों के त्‍यों रखे हुए हैं, जिसमें भारत की बहुलतावादी और समरस संस्‍कृति को कटटर इस्‍लामी व शरिया प्रधान धार्मिक देश बनाने के प्रयत्‍न का सबूत है।

इसके बावजूद सेक्‍यूलरिज्‍म के कीड़े से कटवाए कुछ हिंदू भारतीय मुझसे पूछते हैं कि आप औरंगजेब के पीछे क्‍यों पड़े हैं और कटटर मुसलमान साथी यह कहते हैं कि तुम समाज में नफरत फैला रहे हो। कटटर मुसलमानों के चेहरे को पर्दे के अंदर से बाहर निकालना और लिजलिजे विधर्मी अर्थात जिसने धर्म छोड़ दिया हो- ऐसे धर्मनिरपेक्षों की मूढ़ता को सार्वजनिक रूप से सामने लाना ही तो मेरा असली मकसद है! ‪#‎SandeepDeo‬ ‪#‎TheTrueIndianHistory‬ ‪#‎संदीप_देव‬ #संदीपदेव

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