ड्रग और हथियार इंडस्‍ट्री के लिए मानव को 'गिनी पिग' बनाता आया है अमेरिका!

संदीप देव। अमेरिका जब भी आर्थिक मंदी के दुष्‍चक्र में फंसता है, दुनिया में दो घटनाएं निश्चित रूप से होती है। एक, कोई न काई नया वायरस महामारी का रूप लेता है और दूसरा आतंकवाद और युद्ध की विभीषिका से दुनिया के कई देश जलने लगते हैं। दुनिया में दो ही इंडस्‍ट्री है, जिसके ग्रोथ की रफ्तार में वह ताकत है कि किसी भी देश को आर्थिक मंदी से उबार दे। पहला, ड्रग इंडस्‍ट्री और दूसरा हथियार इंडस्‍ट्री। अमेरिका ड्रग व हथियाार दोनों का सबसे बड़ा निर्माता और निर्यातक देश है।

वर्ष 2007-08 में अमेरिका मंदी में फंसा था और उसी वर्ष दुनिया में 'स्‍वाइन फ्लू वायरस' ने तबाही मचानाा शुरू किया था। अगस्‍त 2007 में फिलिपिंस में और 2009 में नॉर्थ आयरलैंड से यह तबाही शुरू हुई थी। अमेरिकी प्रभाव में काम करने वाले विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने वर्ष 2010 में इसे माहमारी घोषित कर दिया था। मुझे याद है, उस वक्‍त मैं नईदुनिया अखबार में स्‍वास्‍थ्‍य की बीट कवर करता था। मेरे पास स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय का एक दस्‍तावेज हाथ लगा था, जिसमें एक अमेरिकी कंपनी को स्‍वाइन फ्लू के 10 लाख वैक्‍सीन का ऑर्डर दे दिया गया था। ताज्‍जुब देखिए कि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन द्वारा इसे माहमारी घोषित करने से महज दो दिन बाद ही सरकार ने 10 लाख वैक्‍सीन का ऑर्डर दे दिया और वह भी एक ऐसी अमेरिकी कंपनी को, जिसने अभी वैक्‍सीन बनाना शुरू भी नहीं किया थाा उस वक्‍त भारत में इसके मामले सामने नहीं आए थेा मेरी इस खबर को नईदुनिया की वार्षिक बैठक में पांच बेस्‍ट खबर में शामिल किया गया था।

आज भी अमेरिका मंदी के दौर से गुजर रहा है और आज भी 'इबोला' नामक एक जानलेवा वायरस का प्रसार पूरी दुनिया में शुरू हो चुका है। इस वायरस का केंद्र नाइजीरिया है और स्‍वाइन फूल का केंद्र फिलिपींस था। अपनी आर्थिक मंदी से उबरने के लिए अमेरिका तीसरी दुनिया के देशों को 'गिनी पिग'(प्रयोग के लिए उपयोग होने वाला जानवर) की तरह प्रयोग में लाता रहा है।

अब हथियार बाजार की बात कर लें। आपको ख्‍याल होगा, मंदी के उस दौर में मीडिया को हथियार बनाकर अमेरिकी प्रशासन ने इराक में रासायनिक हथियार के नाम पर युद्ध थोपा दिया था, जबकि बाद में कोई रासायनिक हथियार इराक से कभी नहीं मिला। आज भी इराक पर युद्ध थोपा गया है। अमेरिका पहले आतंकियों को हथियार देता है और फिर उस जगह खुद युद्ध थोपता है, इससे हथियार का बाजार दोगुनी गति से आगे बढ़ता है।

ड्रग व हथियार बाजार के लिए मनुष्‍य को गिनी पिग बनाने वाले अमेरिका का एक साधारण व्‍यक्ति होने के नाते हम तो कुछ नहीं बिगाड् सकते, लेकिन अपनी सरकार से उम्‍मीद कर सकते हैं कि वह अमेरिका के राष्‍ट्रपति से लेकर विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, राजदूत आदि के द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बार-बार अमेरिका आने के आग्रह को समझे और सितंबर में होने वाली बैठक में ठीक उसी तरह से अमेरिका को औकात दिखाए, जैसा कि अभी-अभी डब्‍ल्‍यूटीओ के मामले में दिखाया है।

मैं एक साधारण इंसान होने के नाते यही कर सकता हूं कि हर अमेरिकी वस्‍तु का बहिष्‍कार करूं और सामान खरीदने से पहले यह देखूं कि वह किसी अमे‍िरिकी कंपनी का तो नहीं है। नाइजीरिया हो या इराक, याद रखिए सनातन हिंदू धर्म के लिए मानवता का कल्‍याण सबसे ऊपर है। अत: हमारा कर्त्‍तव्‍य है कि मानव को 'गिनी पिग' (guinea pig) बनाने वाले अमेरिका को उसकी ही भाषा में अर्थात आर्थिक बहिष्‍कार के द्वारा जवाब दें। मानवता का घोर दुश्‍मन है अमेरिका!

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