पद्मश्री एक सहज, सजग और सार्थक संवाद को

के. एन. गोविंदाचार्य। पद्म पुरस्कारों के आईने में देखा जाए तो पत्रकारिता का चेहरा इस बार ज्यादा सहज, सजग और सार्थक संवाद करता हुआ दिख रहा है। यह सच है कि व्यक्ति पुरस्कार से बड़ा या छोटा नहीं होता, हां व्यक्तित्व प्रभावी हो तो पुरस्कार की शोभा बढ़ जाती है। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को पद्मश्री से नवाजने से पद्मश्री की प्रासंगिकता और शोभा दोनों बढ़ गई। ऐसा नहीं कहता कि पद्मश्री रायसाहब के लिए मायने नहीं रखता। हां इतना जरूर है कि यह उनके लिए मील के एक पत्थर को पार कर सफर में आगे बढ़ जाने जैसा है। क्योंकि खुद राम बहादुर राय एक जीवंत मील के पत्थर हैं।

जब पत्रकारिता की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता पर ढेरों सवाल हों, ऐसे समय में राम बहादुर राय की उपस्थिति आश्वस्त करती है कि सभी कुछ खत्म नहीं हुआ है। राम बहादुर राय के स्वभाव में बच्चों वाली स्निग्‍धता नहीं है, न परमहंस वाला भोला वैराग्य। उनके अंदर एक दूसरी तरह की सरलता है। कुछ-कुछ ऐसी सरलता, जो पिकासो के शून्य में थी। उनकी सरलता जटिल अनुभवों से लबालब भरी हुई होकर भी कहीं कुटिल तिक्तता का शिकार नहीं दिखती। यह आश्चर्य ही है कि रायसाहब की सरलता कठिन अनुभवों की अंधेरी गुफा से गुजरकर भी मानवीय संवेदनशीलता का नैसर्गिक उजास कहीं नहीं भूली। जयप्रकाश नारायण के बिहार आंदोलन के दौरान रायसाहब के साथ रहते हुए जाना कि अपनी विचार धारा के प्रति निष्ठा रखना, अन्य विचारधाराओं के प्रति सम्मान पूर्वक `डील’ करने में बाधक नहीं होता। यह भी जाना कि जो अपनी विचारधारा के प्रति निष्ठा रख सकता है, वही दूसरी विचारधारा के प्रति सम्मान भी रख सकता है। एक जगह का अवसरवादी, दूसरी जगह निष्ठावादी नहीं हो सकता। सर्व समावेशक चित्तवृत्ति, व्यापक दृष्टिकोण, उदात्त व्यवहार और सभी के प्रति सम्मान की भावना से ही बिहार आंदोलन में दूसरी विचारधारा के लोगों को वे एक मंच पर बैठाने में कारगर हुए। सिर्फ सहनशीलता के भरोसे यह संभव नहीं हो सकता।
बिहार आंदोलन के दौरान वे माला के धागे की तरह थे। वे दिखाई नहीं पड़ते थे। आंदोलन में लालू, सुशील, रविशंकर, रामचंद्ग सिन्हा, नरेंद्ग सिंह, मिथिलेश सिंह और अशोक सिंह दिखाई देते थे। लेकिन सभी के पीछे कोई चितेरा था, तो वे थे राम बहादुर राय।
राय साहब में पारदर्शिता, स्पष्टवादिता और अदभुत बेबाकीपन है। बिहार आंदोलन के दौरान का एक वाकया मुझे याद आता है। चार नवंबर को बिहार विधानसभा का घेराव हो चुका था। जय प्रकाश नारायण पर लाठी चल चुकी थी। जेपी और छात्र नेताओं से इंदिरा गांधी ने कह दिया था कि आप लोकतांत्रिक हैं, तो कुछ ही दिन में चुनाव होने वाले हैं, उसी में क्यों नहीं निपट लेते। विधानसभा भंग करने की मांग यथावत थी। जेल में बंद छात्र नेताओं का विचार था कि जयप्रकाश नारायण को अनशन पर बैठना चाहिए। छात्र नेताओं से मिलने जेपी जेल गए। छात्र नेताओं ने जेपी से अनशन पर बैठने को कहा। लेकिन जेपी ने कहा कि छोटे-मोटे के लिए प्राण दांव पर लगाने का समय नहीं है। राम बहादुर राय यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि `चलो भाई, ये कायर हैं।’ राम बहादुर राय की प्रतिक्रिया से जेपी ठगे से रह गए। लेकिन इससे जय प्रकाश नारायण के प्रति राम बहादुर राय के मन में सम्मान कम नहीं हुआ, न जेपी के मन में उनका।

व्यक्ति से बड़ा दल, दल से बड़ा देश और संगठन से बड़ी मानवीय संवेदनशीलता। इस सिद्धांत को राम बहादुर राय को जीते देखा है। बात वाराणसी में विद्यार्थी परिषद की बैठक की है। राम बहादुर राय को इस बैठक का संचालन करना था, लेकिन वे गायब थे। खोज हुई तो वह बीएचयू के पास लंका स्थित अपने साथी देवव्रत मजूमदार के कमरे पर मिले। देवव्रत मजूमदार बीमार थे। रायसाहब उन पर ठंडे पानी की पट्टी लगा रहे थे और स्टोव पर खिचड़ी बना रहे थे। तब मैं रायसाहब में गांधी की छवि देख रहा था।
पत्रकारिता की बात करूं तो उनका एक स्व की आचार संहिता और मापदंड रहे हैं। बतौर पत्रकार उनके आलेख कभी लच्छेदार भाषण नहीं करते बल्कि सहज, सजग और आमजन से सार्थक संवाद करते हैं। वे न आदेश देते हैं, न संदेश। पर जीवन के कठिनतम पलों में चुपके से आपके ऊहापोह को खत्म जरूर कर देते हैं। और साथ ही गहनतम अंत:स्थल में तैर रहे सार्थक प्रश्नों से आपको रूबरू भी कराते हैं।

1979 की बात है। भाउ राव देवरस से उन्होंने कहा कि अब मैं पूर्णकालिक कार्यकताã नहीं रहूंगा। मेरी शादी हो चुकी है, जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं, मैं घर जा रहा हूं। भाउ राव ने उनसे कहा कि तुम पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने रहो, तुम्हारे लिए मानधन की व्यवस्था हो जाएगी। उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने नौकरी करने का निश्चय किया। बतौर पत्रकार मैंने उनके जीवन में देखा कि कई बार उनके पास ऐसी सूचनाएं पहुंचती थी, जिसकी `न्यूज वैल्यू’ बहुत होती। वह न्यूज हिट होती, लेकिन सोशल वैल्यू के कारण देशहित में उन्होंने उसे जस का तस रहने दिया। इतना ही नहीं, अपने साथियों को वे स्टोरी देने में जरा भी हिचकते नहीं थे। उन्हें अपने करियर की चिंता नहीं थी। वे अपने साथी पत्रकारों के लिए चिंतित रहते थे। पत्रकारिता में आम आदमी के प्रति संवेदनशीलता ही रायसाहब के जीवन का मूल आधार है।

पुराने रिश्तों का सम्मान और विचारधारा से बाहर संपर्क स्थापित करना उनसे सहज सीखा जा सकता है। यही वजह है कि दूसरी विचारधारा के नेताओं का भी उनके ऊपर अटूट विश्वास रहा। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्गशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह उनसे गोपनीय और महत्वपूर्ण बातें भी बेझिझक करते थे। उनका विश्वास था कि रायसाहब को जो हम बता रहे हैं, उसका गलत इस्तेमाल नहीं होगा। रायसाहब इसका इस्तेमाल समाज और देशहित में ही करेंगे।

उनकी जीवनशैली फक्कड़ और अवधूत की तरह रही है और आज भी है। हर कंधे पर हाथ रखकर सुख-दुख पूछ लेने का शील वे कभी नहीं भूले। उनके विनय का विस्तार ही है कि समकालीन से लेकर नवांकुर पत्रकार तक उन्हें अपना आदर्श मानता है। उम्र में छोटा होने के बावजूद मैं उन्हें खुद से बड़ा मानता हूं। इतना जरूर कहूंगा कि यह सम्मान सरलता और मानवीय संवेदनशीलता के प्रतिमूर्ति का है।


साभार: गवर्नेंस नाउ | Monday 16 February 2015
(शिवाजी राय के साथ बातचीत पर आधारित) This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

Web title: Ram Bahadur Rai-1

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