देश तोड़ने वालों को सरदार पटेल की तरह फटकारिए, न कि धर्मनिरपेक्षतावाद का राग अलापिए!

संदीप देव। आतंकवाद पर चर्चा करते हुए तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी, बुद्धिजीवी, वामपंथी, कांग्रेसी प्रवक्‍ता, मुस्लिम नेता व मौलाना लगातार यह कहते रहते हैं कि भारत के मुसलमान भी राष्‍ट्रवादी हैं। लेकिन भारत विभाजन व देश की आजादी का इतिहास इन तथ्‍यों को बहुत हद तक झुठलाता है। आजादी से पूर्व भारत विभाजन के लिए जब मतदान कराया गया था तो उस वक्‍त के अखंड भारत के 90 फीसदी मुसलमानों ने पाकिस्‍तान के पक्ष में मतदान किया था!

 

बंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, मद्रास के मुसलमान जानते थे कि भारत के बीचों-बीच स्थित उनका प्रांत कभी पाकिस्‍तान का हिस्‍सा नहीं बन सकता है, इसके बावजूद उन्‍होंने पाकिस्‍तान के समर्थन में मुस्लिम लीग को समर्थन दिया था। जब पाकिस्‍तान बना तो पाकिस्‍तान की मांग करने वाले और भारत के बीचों बीच के प्रांत के ये मुसलमान यहीं रह गए। और यहां तक कि अलग पाकिस्‍तान की मांग करने वाले कई मुसलमान भारत के संविधान सभा का हिस्‍सा भी बने। अलग पाकिस्‍तान की मांग करने वाले ये लोग इस्‍लामी राज्‍य के हिमायती रहे और ये कभी अखंड भारत के पक्षधर नहीं रहे। आतंकी, जेहादी व कटटर मानसिकता वाले मुसलमान वही हैं, जो पाकिस्‍तान तो चाहते थे, लेकिन मजबूरी में जिन्‍हें यहां रहना पड़ गया।

डॉ दिनकर जोशी की पुस्‍तक 'महामना सरदार' के अनुसार, '' जिस मुस्लिम लीग ने पाकिस्‍तान की रचना की थी, उस मुस्लिम लीग के बंबई, अहमदाबाद या मद्रास से से चुनाव जीते हुए सदस्‍य देश विभाजन के बाद अब भारतीय संविधान सभा का हिस्‍सा बन गए थे। जो कल पाकिस्‍तान की मांग कर रहे थे, वे आज भारत का संविधान रचने बैठे थे। ऐसे लीग के सदस्‍य ने, जो अलग मताधिकार के कारण देश विभाजन की ओर खींचे चले गए थे, वैसा ही अलग मताधिकार और मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग भारत के संविधान में रखी थी। इस मांग के समर्थन में उन मुस्लिम सदस्‍यों ने कहा था, '' हिंदू बड़े भैया हैं और मुसलमान छोटे भैया। यदि छोटे भैया की इस बात को स्‍वीकार करेंगे तो बड़े भैया को इनका प्‍यार मिलेगा, अन्‍यथा उनका प्‍यार हम गंवा देंगे।''

इसके उत्‍तर में सरदार पटेल ने कहा था, '' मैं छोटे भाई का प्रेम गंवा देने के लिए तैयार हूं। हमने आपका प्‍यार देख लिया है। आपको अपनी गतिविधि में परितर्वन करना चाहिए, अन्‍यथा बड़े भैया की मौत भी हो सकती है। अब ये सारी चर्चा छोड़ दो। आप सहयोग देना चाहते हैं या तोड़-फोड़ की युक्ति आजमाना चाहते हैं। अब अतीत को भूलकर आगे का देखो। आपको जो चाहिए था, वह मिल गया है। याद रखिए, आप लोग ही पाकिस्‍तान के लिए जिम्‍मेदार हैं, पाकिस्‍तान के निवासी नहीं। आप लोग ही आंदोलन के अगुआ थे। अब आपको क्‍या चाहिए। हम नहीं चाहते कि देश फिर से विभाजित हो जाए।''

बड़ी संख्‍या में दिल्‍ली में भी पाकिस्‍तान की मांग करने वाले मुसलमान रह गए थे, जिसके लिए विभाजन के बाद मुस्लिम प्रतिनधियों ने जवाहरलाल नेहरू से मांग की थी कि दिल्‍ली में बिखरे हुए मुसलमानों को एक साथ और बहुमत के विस्‍तार में बसाया जाए ताकि उनमें सुरक्षा बोध बढ़े। सरदार पटेल ने इसका जबरदस्‍त विरोध किया और उन्‍होंने कहा, '' ऐसा करने से पूरा दिल्‍ली नगर संप्रदायिकतावादी स्‍तर पर विभाजित हो जाएगा।''

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का विचार दूसरा था। उन्‍होंने कहा था, '' सरकार और बहुसंख्‍यक जनता (हिंदू) का यह कर्त्‍तव्‍य है कि मुसलमानेां में भय या न्‍यूनता की भावना शेष नहीं रहे।'' इस पर सरदार पटेल ने कहा था, था, '' जिन्‍हें पाकिस्‍तान चाहिए था, उन्‍हें वह मिल गया है। जिनकी द्धि-राष्‍ट्र में श्रद्धा है, वे वहां चले जाएं और सुख से रहें। अब यहां रहने वाले मुसलमानों का कर्त्‍तव्‍य है कि वे अपने कर्मों द्वारा इस देश की बहुसंख्‍यक जनता को विश्‍वास दिलाएं कि वे इस देश के वफादार हैं।''

देखिए सरदार ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा था कि यहां के मुसलमान अपने कर्मों द्वारा अपनी वफादारी का सबूत दें, क्‍योंकि भारत को तोड़ने की मांग उनके बीच से ही उठी थी। इसलिए आज जब आतंकवाद के जरिए भारत का तोड़ने का प्रयास चल रहा है और देश के अंदर कई जेहादी समूह और व्‍यक्तियों के समर्थन से यह हो रहा है तो मुस्लिमों को खुलकर ऐसे लोगों का विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उल्‍टा रहा है।

आतंकवाद की बात उठाते ही खुद मुस्लिम और नेहरू की तरह तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावाद से पीडि़त 'आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता' का राग अलाप कर देश के इतिहास से मुंह चुराने का कार्य कर रहे हैं। आतंकवाद का यदि धर्म नहीं है तो इराक से लेकर भारत तक एक ही धर्म के लोग आतंकवाद में क्‍यों उलझे हुए हैं। और यह उस धर्म के उदार लोगों का ही कर्तव्‍य है कि वह इन जेहादियों को अपने समाज से अलग-थलग करने के लिए आंदोलन चलाएं, लेकिन मुझे तो मुस्लिम समाज के बीच से इक्‍का-दुक्‍का बयान को छोड़कर ऐसे किसी आंदोलन का इतिहास नहीं मिलता है, जो अपने ही धर्म के जेहादी, कटटर व बहाबी मानसिकता को अलग-थलग करने के लिए चलाया गया हो।

सरदार पटेल कटटर व जेहादी मानसिकता के मुसलमानों से जिस भाष में बात करते थे, यदि आज के नेता जरा भी उस भाषा में बात करें तो तत्‍काल उन्‍हें सांप्रदायिक करार दिया जाएगा। हैदरबाद के कासिम रिजवी ने सरदार को धमकी दी थी कि '' यदि हैदराबाद के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई की जाएगी तो हैदराबाद में निवास करने वाली हिंदू जनता की स्थिति अत्‍यधिक मुश्किल हो जाएगी। इसके प्रत्‍युत्‍तर में सरदार पटेल ने कहा था, '' भारत में करोड़ों मुसलमान निवास करते हैं। यह आपको याद रखना चाहिए।''

साभार सभी तथ्‍य:  डॉ दिनकर जोशी की पुस्‍तक 'महामना सरदार', प्रभात प्रकाशन से लिया गया है।

Web title: History of Sardar Vallabhbhai Patel.1

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