आभार आपका...

संदीप देव। मैं संस्‍कृत का इतिहास पढ रहा था, सोचा आपको बताऊं। मैं सभी मित्रों से अनुरोध करूंगा कि किसी के प्रति अपनी धन्‍यता प्रकट करने के लिए आप अंग्रेजी के 'थैंक्‍यू' की जगह हिंदी के बेहद ही खूबसूरत 'आभार' शब्‍द का इस्‍तेमाल करें। थैंक्‍यू कहने और सुनने में ऐसा लगता है कि जैसे एहसान उतारने की तत्‍काल कोशिश की जा रही हो। लेकिन 'आभार' हमेशा एहसान को सीने में बसाए रखने का अहसास कराती है। आभार में हमारी संस्‍कृति, हमारे संस्‍कार का बोध छिपा और सुनाई देता है।

हिंदी में इसके लिए आप 'धन्‍यवाद' का इस्‍तेमाल भी कर सकते हैं, लेकिन इसे बार-बार उपयोग में न लाएं। यह शब्‍द परमात्‍मा, माता-पिता, गुरु के लिए एक तरह से आरक्षित है। धन्‍यवाद अर्थात मेरे 'धन्‍य भाग्‍य'... और भाग्‍य की धन्‍यता केवल परमात्‍मा, माता-पिता और गुरु के लिए या फिर ऐसे व्‍यक्ति के लिए होना चाहिए, जिसके कारण से आपका जीवन, आपके होने का अर्थ है। जीवनदान देने वालों के लिए भी धन्‍यवाद का उपयोग ही करना चाहिए। 'धन्‍यवाद' बेहद कृतज्ञतापूर्ण शब्‍द है।

वैसे ऊर्दू का 'शुक्रिया' भी मीठा शब्‍द है। इसका अर्थ है कि शुक्र है कि आपकी मेहरबानी हुई। लेकिन इन सभी शब्‍दों में आम बोलचाल में यदि आप 'आभार' को शामिल करेंगे तो यह दिल की गहराईयों तक उतरता और अपनी संस्‍कृति का सही प्रतिनिधित्‍व करता हुआ प्रतीत होता है। आप कोशिश करके तो देखिए... । वैसे मैंने ने यूं ही कह दिया। इसलिए कोई इसे अन्‍यथा न ले...

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