कविता: ओह मां !

संजू मिश्रा। ओह मां !

आज माँ नहीं है,
कोई माँ जैसा भी नही है।

माँ के जाते वह बचपन भी नही है।
बची है तो
बचपन की यादें
दिल की मुरादे
प्यार से गुस्सा, गुस्से में भी प्यार,
स्नेह का स्पर्श , वह मीठा सा दुलार।

अब ये सब
कहाँ से लाऊँ, कहाँ से पाऊ
माँ नहीं है और
कोई माँ जैसा भी नही है।


समय का हाल
लम्बा अंतराल
मैं भी बड़ी हो गई
बच्ची से युवा और फिर माँ हो गई।
मैं भी अपनी प्यारी बेटी की माँ हूँ।
उसकी खुशियों की चाह हूँ।

पर माँ
जब मैं उसे बुलाती हूँ
तो अनायास मुझे लगता है तुम बुला रही हो,
कुछ बता रही हो, कुछ सिखा रही हो।

पर सच्चाई है,
आज माँ नहीं है
कोई माँ जैसी भी नही है।

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