मैं किसी तरह की स्तुति में भरोसा नहीं करता: ओशो

ओशो। तुम मेरी प्रंशसा मत करो। तुम मेरी प्रशंसा से कुछ भी नहीं पा सकते हो। मुझे धोखा देना असंभव है। मैं किसी तरह की स्तुति में भरोसा नहीं करता। तुम जैसे हो, मुझे स्वीकार हो। मगर यह ‘खोटे’ वगैरह होने का अहंकार मत घोषित करो। ये तरकीबें नहीं। खोटे हो, तो ठीक। क्या हर्जा? कौन खोटा नहीं है? मगर खोटे की घोषणा करके तुम इस भ्रांति में न पड़ो कि तुम दूसरो से विशिष्ट हुए जा रहे हो। वही मोह भीतर छिपा है।

अब तुम कह रहे हो कि ‘आपकी कृपा से मेरा तमस शांत हो गया है।’ मेरी कृपा से अगर लोगों का तमस शांत होने लगे तो मैं सारी दुनिया का तमस शांत कर दूं। मेरी कृपा से कुछ भी नहीं होता।

तुम मेरी प्रंशसा मत करो। तुम मेरी प्रशंसा से कुछ भी नहीं पा सकते हो। मुझे धोखा देना असंभव है। मैं किसी तरह की स्तुति में भरोसा नहीं करता। तुम जो यह कह रहे हो-’आपकी कृपा से मेरा तमस शांत हो गया है’-इस कहने में ही तमस मौजूद है, अंधेरा मौजूद है।

तुम सोच रहे हो उसी ढंग से, जैसे आम आदमी को प्रभावित किया जाता है। हां, किसी राजनेता से जा कर कहोगे कि ‘आपकी कृपा से’ तो वह आहृलादित हो जायेगा। किसी महात्मा से कहोगे कि आपकी कृपा से ऐसा हो गया, तो वह आहृलादित हो जायेगा।

मैं अहमदाबाद से बंबई आ रहा था। एक व्यक्ति एकदम मेरे पैरों पर गिर पड़ा हवाई जहाज में। जैसे ही मैं अंदर गया, एकदम मेरे पैरों पर गिर पड़ा और कहा कि ‘आपकी कृपा से गजब हो गया।’ मैंने पूछा, क्या गजब हो गया, मैं थोड़ा समझ लूं। क्योंकि मैंने किसी पर कोई कृपा नहीं की। इसलिए मैं जिम्मेवार नहीं हो सकता हूं।’

वह थोड़ा चौंका क्योंकि उसने और बहुत से महात्माओं पर यही चाल चलायी होगी, यही तीर चलाया होगा। और जैसे महात्मा है, उन पर यह तीर एकदम चलता है। उनके पैरों पर गिर पड़ो और कहो, ‘आपकी कृपा से घर में बच्चा हो गया, मुकदमा जीत गया, नौकरी लग गयी’, तो वे मुस्करा कर सिर हिलाते हैं और कहते हैं कि ठीक! ठीक बच्चा! अरे मेरी कृपा से क्या नहीं हो सकता।’

यह आदमी थोड़ा चौंका। मैंने किसी पर कृपा हीं नहीं की। कब हुई यह कृपा? कैसी कृपा और क्या हुआ?’

उसने कहा, ‘नहीं, आप छिपाने की कोशिश न करो।’

मैंने कहा,‘नहीं मैं छिपाने की कोशिश नहीं कर रहा। मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि क्या, हुआ क्या है?’

उसने कहा, ‘मैं मुकदमा जीत गया।’

मैंने कहा, मैं मुकदमें जिताता हूं? और सच्चाई क्या थी-मुकदमा तुझे जीतना था कि नहीं? तूने किया क्या था?

उसने कहा, ‘अब आपसे क्या छिपाना? संभावना तो मेरे हारने की थी, क्योंकि मेरा मामला झूठा था। मगर आपकी कृपा से क्या नहीं हो सकता।’

तो मैंने कहा, ‘देख, तू नरक जायेगा, और मुझे भी ले चलेगा। तू भैया अकेला जा। और अगर मुझे नरक ले चलना है साथ में, तो कितना रूपया जीता है अदालत से?’

उसने कहा, ‘कि कोई पचास हजार रुपया।’ तो मैंने कहा,‘पच्चीस हजार मुझे दे दे। बात खत्म कर। अगर नरक भी चलना है, तो मैं मुफ्त नहीं जाऊंगा।’

वह बोला,‘ अरे नहीं-नहीं, आप जैसे महापुरुष को कहां पैसे से पड़ी।’

मैंने कहा, ‘देख, यह नहीं चलेगा। नरक जाते वक्त मैं भी फसूंगा, क्योंकि मुझसे भी पूछा जायेगा, क्योंकि इस पर कृपा? यह हारना था मुकदमें, सजा होनी थी इसकी छह साल की। सजा भी नहीं हुई, उल्टे यह पचास हजार रूपये मुकदमें में जीत भी गया। तो सजा मेरी होगी। और वे पचास हजार में से कम से कम पच्चीस हजार तो तुझे भरने ही पड़ेंगे और तीन साल तो कम से कम मुझे भी नर्क में काटने पड़ेंगे। तू पच्चीस हजार मुझे दे ही दे।’

वह आदमी तो ऐसा चौंका। उसने कहा कि ‘मैं बहुत महात्माओं के पास गया, आप कैसी बात कर रहे है।’ मैंने कहा, ‘मैं बात सीधी-साफ कर रहा हूं। तू जो भाषा समझता है वही बात कर रहा हूं। या फिर अपनी बात वापस ले ले। मैंने तो तुझसे कहा नहीं। मैंने दावा किया नहीं कि मैंने तुझ पर कृपा की। मैं तो इनकार ही कर रहा हूं, अभी भी इनकार कर रहा हूं। लेकिन अगर तू मानता है मैंने कृपा की, तो फिर हिस्सा कर ले।’

वह तो बिलकुल पीछे जा कर बैठ गया। मगर मैं दो-तीन दफा उसके पास गया उठ-उठ कर, कि ‘भैया, तू क्या करता है? बंबई करीब आयी जा रही है’ वह तो अपना अखबार पढ़े। मैंने कहा, ‘अखबार-वखबार बाद में पढ़ना, व रूपये दे दे। फिर बंबई में मैं तुझे कहां खोजता फिरूंगा? तेरा नाम क्या? तेरा पता क्या?

बोला, ‘आप क्यों मेरे पीछे पड़े हैं?’

मैंने कहा, ‘कृपा के वक्त तू मेरे पीछे पड़ा था।’

उसने अपना सिर ठोंक लिया। उसने कहा, ‘मैं माफी मांगता हूं। मैं आपके चरण छूता हूं।’

मैंने कहा, ‘तो कह दे कि मैंने कृपा नहीं की।’

उसे कहने में भी डर लगे, क्योंकि उसे यह डर लगे कि कहीं आगे कोई दचका न खाना पड़े। मैंने कहा कि ‘तू बिलकुल बेफिक्री से कह दे, ताकि आगे जब निर्णय होगा, तो मैं भी कह सकूंगा कि इसने साफ मना कर दिया था कि मैंने कृपा की ही नहीं।’

वह न कहे। उसमें उसकी घबड़ाहट कि पता नहीं, इन साधु-महात्माओं का क्या। फिर कल कोई झंझट में फंसा दें। किसी तरह तो बचा हूं।

वह कहने लगा, ‘आप मुझ पर कृपा करों।’

मैंने कहा, ‘देख, एक कृपा की, उसका तूने अभी भुगतान भी नहीं किया, उधारी ही चला रहा है। अब और कृपा करूं तेरे पर? तू माफी मांग ले और साफ कह दे कि आपने कृपा नहीं की, नहीं तो बंबई उतरते ही से मेरे लोग वहां होगे, पकड़ा दूंगा फौरन। और तूने मुझसे कहा है कि मुकदमा तू झूठा जीता है, शोरगुल मचा दूंगा कि इसका मुकदमा झूठा है। अदालत में घसीटूंगा।’

ये जो लोग है, ये सब बेईमान हैं। लेकिन इनसे महात्मा भी प्रसन्न!

महात्माओ की तो तुम बात ही छोड़ो, लोग देवी-देवताओं को, भगवान को, सबको रिश्वतें दे रहे हैं। इसलिए इस देश से रिश्वत को मिटाना बहुत मुश्किल है।

आखिर में

राजनैतिक लुच्चों-लफंगों से देश को छुटकारा कब मिलेगा?

ओशो ने जवाब दिया, "बहुत कठिन है.. क्योंकि प्रश्न राजनेताओं से छुटकारे का नही है, प्रश्न तो तुम्हारे अज्ञान के मिटने का है. तुम जब तक अज्ञानी हो, कोई न कोई तुम्हारा शोषण करता रहेगा. कोई न कोई तुम्हें चूसेगा. पंडित चूसेंगे, पुरोहित चूसेंगे, राजनेता चूसेंगे. तुम जब तक जाग्रत नही होगे, तब तक लुटोगे ही. फिर किसने लूटा, क्या फर्क पड़ता है ? किस झण्डे की आड़ में लुटे, क्या फर्क पड़ता है.. समाजवादियों से लुटे कि साम्यवादियों से.. क्या फर्क पड़ता है. तुम लुटोगे ही.. बस, लुटेरों के नाम बदलते रहेंगे और तुम लुटते रहोगे. यह मत पूछो कि राजनीतिक लुच्चों-लफंगों से देश को छुटकारा कब मिलेगा. यह प्रश्न अर्थहीन है. यह पूछो कि मै कब इतना जाग सकूँगा कि झूठ को झूठ की तरह पहचान सकूँ और जब तक सारी मनुष्य जाति झूठ को झूठ की भाँति नही पहचानती, तब तक छुटकारे का कोई उपाय नही है.।

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