अपने शरीर को जानो, क्‍योंकि शरीर प्राचीन है: ओशो

ओशो। शरीर को भलीभांति काम करना चाहिए, अच्छी तरह से। यह एक कला है, यह तप नहीं है। तुम्हें उसके साथ लड़ना नहीं है, तुम्हें उसे केवल समझना है। शरीर इतना बुद्धिमान है ... तुम्हारे मस्तिष्क से बुद्धिमान, ध्यान रहे, क्योंकि शरीर मस्तिष्क से ज्यादा समय जीया है। मस्तिष्क बिल्कुल नया आया है, महज एक बच्चा है।

शरीर बहुत प्राचीन है, बहुत ही प्राचीन ... क्योंकि कभी तम एक पत्थर की तरह जीते थे––शरीर तो था लेकिन मन सोया हुआ था। फिर तुम एक पेड़ हुए; शरीर था उसकी पूरी हरियाली और फूलों के साथ। लेकिन मन अभी भी गहरी नींद सोया था; पत्थर की तरह न सही लेकिन फिर भी सोया तो था। फिर तुम बाघ हुए, पशु हुए,; शरीर ऊर्जा से इतना ओतप्रोत था लेकिन मन काम नहीं कर रहा था। तुम पक्षी हुए, मनुष्य हुए ... शरीर लाखों साल से कार्यरत है। शरीर ने अत्यधिक प्रज्ञा इकट्ठी कर ली है। शरीर बहुत प्रज्ञावान है। इसलिए यदि तुम बहुत ज्यादा खाते हो तो शरीर कहता है, ' रुक जाओ!' मन इतना बुद्धिमान नहीं है। मन कहता है, 'स्वाद अच्छा है, थोड़ा अधिक लो।' अगर तुम मन की सुनते हो तो तो मन शरीर का नुकसान करता है किसी न किसी प्रकार से। यदि तुम मन की सुनोगे, तब मन पहले तो कहेगा, ' खाये जाओ।' क्योंकि मन मूर्ख है, बच्चा है। वह नहीं जानता वह क्या कह रहा है। वह नया-नया आया है। उसके भीतर कोई शिक्षा नहीं है। वह बुद्धिमान नहीं है, वह अभी भी मूर्ख है। शरीर की सुनो। जब शरीर कहता है, भूख लगी है तब खाओ। जब शरीर कहता है, रुक जाओ, तब रुको।

जब तुम मन की सुनते हो तो यह ऐसा है जैसे एक छोटा बच्चा एक बूढ़े आदमी को राह दिखा रहा है, वे दोनों गड्ढे में गिरेंगे। अगर तुम मन की सुनोगे तो पहले तुम इंद्रियों में गिर जाओगे और फिर तुम उससे ऊब जाओगे। हर इंद्रिय तुम्हारे लिए दुख ले आएगी और हर इंद्रिय अधिक चिंता, क्लेश और पीड़ा ले आएगी। अगर तुमने बहुत ज्यादा खा लिया तो पीड़ा होगी और फिर उलटी हो जाएगी। पूरा शरीर अस्तव्यस्त हो जाता है। तब मन कहता है, 'भोजन बुरा है, इसलिए उपवास करो।' और उपवास सदा खतरनाक होता है। अगर तुम शरीर की सुनो तो वह कभी ज्यादा नहीं खाएगा और न कभी कम खाएगा; वह सिर्फ ताओ का अनुसरण करेगा।

कुछ वैज्ञानिक इस समस्या पर काम कर रहे हैं और उन्होंने बहुत सुंदर तथ्य की खोज की है: छोटे बच्चे तभी खाते हैं जब वे भूखे होते हैं, वे तभी सोते हैं जब उन्हें नींद आती है। वे अपने शरीर की सुनते हैं। लेकिन उनके माता-पिता उनमें बाधा डालते हैं। वे जबरदस्ती करते हैं कि यह भोजन का समय है, या लंच का समय है, या सोने का समय है.... अब जाओ! वे उनके शरीर को मुक्त नहीं छोड़ते।

एक अन्वेषक ने बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया। वह पच्चीस बच्चों पर काम कर रहा था। उन पर सोने की जबरदस्ती, या उठने की जबरदस्ती नहीं की गई। छह महीने तक उन पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। और एक गहन समझ विकसित हुई।

वे गहरी नींद सोए , उन्हें कम सपने आए, कोई डरावने सपने नहीं आए , क्योंकि डरावने सपने मां-बाप के कारण आ रहे थे जो उन पर जबरदस्ती करते थे। उन्होंने खाना ठीक से खाया, न जरूरत से ज्यादा न कम । उहोंने खाने का मज़ा लिया और कभी-कभी वे खाना बिलकुल नहीं खाते। जब शरीर राजी नहीं होता तो वे खाना नहीं खाते। और भोजन के कारण होनेवाली बीमारी से वे बीमार नहीं हुए।

इससे एक बात समझ में आई जिसका किसी को शक भी नहीं हुआ था और वह चमत्कार था। सिर्फ सोसान इसे समझ सकता है, या लाओत्ज़ु या च्वांग्त्ज़ु। क्योंकि ये लोग ताओ के अधिकारी हैं। यह ऐसी अद्भुत खोज थी। उन्हें यह समझ आई कि जब बच्चा बीमार हो तो वह एक खास तरह का खाना नहीं खाता। फिर उन्होंने समझने की कोशिश की कि वह ये चीजें क्यों नहीं खा रहा है। उनका जब विश्लेषण किया गया तब पाया गया कि उस बीमारी के लिए वह भोजन हानि कारक है। अब बच्चे ने कैसे तय किया? सिर्फ शरीर के कारण ....

जब बच्चा बड़ा हो रहा था तब उसके विकास के लिए जो भी जरूरी था उसे वह ज्यादा खाता था। फिर उन्होंने भोजन का विश्लेषण किया और पाया कि ये चीजें सहयोगी थीं। भोजन बदल जाता क्योंकि जरूरतें बदल जातीं। एक दिन बच्चा कुछ खाता और दूसरे दिन वही बच्चा उसे नहीं खाता था। और वैज्ञानिकों को अहसास हुआ कि शरीर की प्रज्ञा होती है।

अगर तुम शरीर को उसके हिसाब से चलने दो तो तुम सही रास्ते पर हो, राज मार्ग पर। और यह सिर्फ भोजन के बारे में सच नहीं है, यह पूरे जीवन के बारे में सच है। तुम्हारा सेक्स विकृत होता है तुम्हारे मन के कारण, तुम्हारा पेट गड़बड़ होता है तुम्हारे मन के कारण। तुम शरीर में हस्तक्षेप करते हो। हस्तक्षेप मत करो! अगर तीन महीने तक भी इसका पालन कर सको कि हस्तक्षेप मत करो तो अकस्मात तुम स्वस्थ हो जाओगे, और तुम्हारे ऊपर एक आंतरिक स्वास्थ्य उतरेगा। सब कुछ ठीक नजर आएगा। जैसे जूता पैर में फिट हो गया। लेकिन मन समस्या है।

अगार तुम इंद्रियों की सुनोगे तो तुम सरल हो जाओगे। निश्चय ही कोई तुम्हें आदर नहीं देगा क्योंकि वे कहेंगे, 'यह भोगी आदमी है।' एक भोगी आदमी गैरभोगी आदमी से अधिक जीवंत होता है। शरीर की सुनो। क्योंकि यहां तुम इस क्षण का आनंद लेने के लिए हो जो तुम्हें मिला है, यह प्रसादपूर्ण क्षण, यह धन्यता जो तुम्हारे साथ घटी है। तुम जीवंत हो, जागरूक हो, और इतने विराट विश्व में।

इस छोटे से ग्रह पर, बहुत छोटे, नन्हे से ग्रह पर मनुष्य एक चमत्कार है। सूरज साठ गुना ज्यादा बड़ा है इस पृथ्वी से। और यह सूरज सामान्य है, ऐसे लाखों सूरज हैं और लाखों विश्व और ब्रह्माण्ड हैं। अब तक ऐसा लगता है, जहां तक विज्ञान की पहुंच है, कि जीवन और चेतना सिर्फ इस धरती पर घटी है। यह धरती धन्य है।

तुम्हें पता नहीं है तुमने क्या पाया है। यदि तुम्हें इसका अहसास हो कि तुमने क्या पाया है, तुम बहुत कृतज्ञ होओगे और इससे अधिक कुछ नहीं मांगोगे। तुम एक चट्टान भी हो सकते थे और तुम इसके बाबत कुछ नहीं कर सकते थे। तुम एक मनुष्य हो। और तुम दुख झेल रहे हो, और तुम चिंतित हो और तुम पूरी बात ही चूक रहे हो। इस क्षण का आनंद लो क्योंकि यह क्षण दुबारा नहीं आएगा।

हिंदुओं का यही अभिप्राय है: वे कहते हैं, तुम फिर से चट्टान बन जाओगे। अगर तुम आनंद नहीं लोगे और विकसित नहीं होओगे तो तुम नीचे गिर जाओगे। तुम एक जानवर बन जाओगे। यह अर्थ है: हमेशा याद रखना कि चेतना की यह चरम दशा एक ऐसा शिखर है: अगर तुम इसका आनंद नहीं लेते या इससे केंद्रित नहीं होते तो तुम नीचे गिर जाओगे।

गुर्जिएफ कहता था कि अभी तुम्हारे पास आत्मा नहीं है; जीवन केवल एक अवसर है उसे पाने का, आत्मवान होने का। और कौन जाने यह अवसर फिर कब मिलेगा या नहीं मिलेगा? कोई नहीं जान सकता, कोई है ही नहीं जो इसके बारे में कुछ कह सकता है।

इतना ही कहा जा सकता है कि इस क्षण यह मौका तुम्हें मिला है। यदि तुम इसका आनंद लेते हो, यदि तुम उसमें मस्त हो जाते हो, कृतज्ञता अनुभव करते हो तो वह और सघन हो जाएगा। तुमहरे पास जो भी है वह बहुत ज्यादा है। अनुगृहीत होने के लिए आभारी होने के लिए यह काफी है। अस्तित्व से और मत मांगो। तुम्हें जो मिला है उसका मज़ा लो। और तुम जितना मज़ा लोगे उतना तुम्हें और दिया जाएगा।

जीसस एक बहुत विरोधाभासी बात कहते हैं, ' यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा। ' यह तो बेतुका मालूम होता है। किस तरह का गणित है यह? ' यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा।' लगता है यह धनवान आदमी के लिए है और गरीब आदमी के विपरीत है।जीसस एक बहुत विरोधाभासी बात कहते हैं, ' यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा। ' यह तो बेतुका मालूम होता है। किस तरह का गणित है यह? ' यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा।' लगता है यह धनवान आदमी के लिए है और गरीब आदमी के विपरीत है।

इसका सामान्य अर्थशास्त्र से कोई संबंध नहीं है, यह तो जीवन का परम अर्थशास्त्र है। जिनके पास है उन्हें अधिक दिया जाएगा क्योंकि जितना वे मज़ा लेंगे उतना वह बढ़ेगा। जीवन विकसित होता है आनंद के कारण। प्रसन्नता सूत्र है। प्रसन्न होओ, अंनुगृहीत होओ जो भी है उसके प्रति। जो भी! उसमें मस्त हो जाओ, फिर और खुलता है, तुम्हारे ऊपर और गिरता है। तुम इस योग्य हो जाते हो कि तुम्हारे ऊपर और आशीष उतरे। जो अनुगृहीत नहीं है वह उसे भी खो देगा जो उसके पास है। जो अनुगृहीत है उसे समूचा अस्तित्व मदद करेगा कि वह अधिक विकसित हो क्योंकि वह योग्य है और उसे उसकी कदर है जो उसे मिला है।

इसका सामान्य अर्थशास्त्र से कोई संबंध नहीं है, यह तो जीवन का परम अर्थशास्त्र है। जिनके पास है उन्हें अधिक दिया जाएगा क्योंकि जितना वे मज़ा लेंगे उतना वह बढ़ेगा। जीवन विकसित होता है आनंद के कारण। प्रसन्नता सूत्र है। प्रसन्न होओ, अंनुगृहीत होओ जो भी है उसके प्रति। जो भी! उसमें मस्त हो जाओ, फिर और खुलता है, तुम्हारे ऊपर और गिरता है। तुम इस योग्य हो जाते हो कि तुम्हारे ऊपर और आशीष उतरे। जो अनुगृहीत नहीं है वह उसे भी खो देगा जो उसके पास है। जो अनुगृहीत है उसे समूचा अस्तित्व मदद करेगा कि वह अधिक विकसित हो क्योंकि वह योग्य है और उसे उसकी कदर है जो उसे मिला है।

Courtesy: ओशो, द बुक ऑफ नथिंग:सिन सिन मिंग प्रवचन #6

Web Title: Osho speaks on body-1

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