गुमान में न रहें, यह आआपा के पक्ष में सकारात्‍मक नहीं, भाजपा को हराने के लिए नकारात्‍मक वोट था

संदीप देव। आआपा की बंपर जीत और भाजपा की हार में बहुत सारे लोग दिल्‍ली की जनता की मुफतखोरी को दोष दे रहे हैं। मत भूलिए कि इसी जनता ने पिछली बार भाजपा को नंबर एक की पार्टी और लोकसभा की सभी 7 सीट जीत कर दी है। दरअसल आप सभी मीडिया के बहकावे में आकर कहेंगे कि यह सकारात्‍मक वोट है, जनता ने केजरीवाल को जिताया है, लेकिन मैं आपको पॉकेट वाइज बताऊंगा कि यह नकारात्‍मक वोट है और यह भाजपा को हराने के लिए डाला गया था! उच्‍च वर्ग से लेकर निम्‍न वर्ग और गांव के किसान तक ने भाजपा के खिलाफ गोलबंद होकर वोट दिया है। सबके अपने अपने कारण थे, लेकिन यह कारण मुफतखोरी से अधिक झूठे प्रचार और भीतराघात से उपजा था, जिसका अनुभव मैंने खुद कई इलाको में जाकर किया था और बार-बार खुद प्रधानमंत्री मोदी को टवीट कर बताने की कोशिश की थी, लेकिन जनता की सुनता कौन है जी...!

उच्‍च वर्ग जैसे दक्षिणी दिल्‍ली का इलाका जैसे हौजखास, वसंत कुंज, वसंत विहार, मालवीय नगर आदि में भाजपा के खिलाफ विदेशी फंडेड पूरा एनजीओ समूह उतरा हुआ था। यही वो इलाका है, जहां करोडपति एनजीओ का गिरोह सबसे अधिक सक्रिय है। इस समूह को मुफतखोरी से कोई वास्‍ता नहीं था। यह एलिट व सोसलाइट क्‍लास एनजीओ माइंडेट है, जो शुरू से मोदी विरोधी रहा है। यह वर्ग केजरीवाल के प्रचार में पूरी तरह से कूदा हुआ था। ग्रीनपीस एनजीओ के प्रिया पिल्‍लई के लंदन जाने पर रोके जाने और 750 एनजीओ पर कार्रवाई के भय ने इन सभी को एकजुट कर दिया था। यही वह ग्रुप है जो सोनिया गांधी के एनएसी का हिस्‍सा रह चुका है।

उच्‍च मध्‍य वर्ग और मध्‍यवर्ग जो भाजपा का हमेशा से वोटर रहा है, उसने भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं के कहने पर भाजपा के खिलाफ वोट किया। अमित शाह-मोदी को सबक सिखाने के लिए मध्‍यवर्गीय भाजपा समर्थक मतदाताओं की विधानसभा वाइज सूची भाजपा कार्यकर्ताओं ने आआपा के लोगों को सौंपी थी और उसके बाद आआपा के कार्यकर्ता एक एक घर में तीन तीन बार गए थे। खुद मेरे घर में तीन बार आए थे। उनके साथ स्‍थानीय भाजपा के कार्यकर्ता भी जाते थे और उन्‍हें अमित शाह -मोदी को सबक सिखाने के लिए कहते थे।

यहीं नहीं, यही वर्ग हिंदुत्‍व व राष्‍ट्रवाद को लेकर भी चिंतित रहता है। संघ के कार्यकर्ता इन्‍हें यह समझाने में सफल रहे कि आधी अधूरी दिल्‍ली में मोदी की हार उन्‍हें गो रक्षा, धर्मातरिण विरोधी बिल, एफडीआई के निर्णय को वापस लेने और समान आचार संहिता की मूल भावना की ओर लौटा लाएगा। सूचना है कि कम से कम 20 से 26 संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं को आआपा ने टिकट दिया था, जिसमें सभी जीतने में सफल रहे।

सरकारी कर्मचारी: सरकारी कर्मचारी के बीच आआपा यह झूठ फैलाने में पूरी तरह से सफल रही कि उनके रिटायरमेंट की अवधि को मोदी सरकार दो वर्ष कम करने जा रही है। सरकारी कर्मचारी इस बात से भी नाराज हैं कि उन्‍हें प्रतिदिन सुबह 9 बजे कार्यालय पहुंचना पड़ रहा है। बैंक के कई कर्मचारियों ने कहा कि हमें लोगों के बैंक एकाउंट खोलने में लगा दिया गया है। हमारी प्रोडक्टिविटी समाप्‍त हो गई है। सरकारी कर्मचारी का शायद एक भी वोट भाजपा को नहीं मिला। शुरू से कांग्रेस को वोट देते आ रहे ये लोग, इस बार कांग्रेस की जगह भाजपा को हराने के लिए पूरे दमखम के साथ आआपा को वोट दिया।

निम्‍न वर्ग: दिल्‍ली का निम्‍न वर्ग अधिकांशत: झुग्‍गी, पुनर्वास व अनधिकृत कालोनी में रहता है। इनमें से अधिकांशत: पूर्वांचल के लोग हैं। मैंने बार बार लिखा और मोदी व अमित शाह को लगातार टवीट भी किया था कि राजधानी के पूरब से पश्चिम और उत्‍तर से दक्षिण तक एक ही बात कह रहे थे कि फूल के आ जाने पर दिल्‍ली से गरीबों को भगा दिया जाएगा। आआपा ने तो इसे फैलाया ही था, भाजपा के कार्यकर्ताओं ने भी इसमें मदद की कि मोदी जी दिल्‍ली को स्‍मार्ट सिटी बनाने के क्रम में झुग्‍गी को उजाड़ देंगे और 2022 तक दिल्‍ली झुग्‍गी मुक्‍त होगी। मोदी के बयान को उल्‍टा समझाया गया और समूची गरीब बिरादरी, जो कांग्रेस, बसपा आदि के वोटर थे, मोदी को हराने के लिए एकमुश्‍त आआपा को वोट दिया।

भाजपा ने पूर्वांचल की पूरी तरह से हमेशा से उपेक्षा की है जबकि आआआ ने 11 पूर्वांचलियों को टिकट दिया और उन्‍हें उजाडे जाने से बचाने का भरोसा दिया। दिल्‍ली की बदलती जनसंख्‍या को भाजपा कभी स्‍वीकार करने की कोशिश नहीं करती और पूर्वांचली को ठेंगे पर रखने का प्रयास करती है, जो इस बार भारी पड़ी। यह वर्ग हमेशा से कांग्रेस का वोटर रहा और आआपा से सम्‍मान, टिकट मिलने पर उसकी ओर शिफट हो गया। कांग्रेस का आआपा की ओर शिफटेड वोट में अधिकांश उत्‍तरप्रदेश, बिहार, उत्‍तराखंड, राजस्‍थान, बंगाल, उडीसा के वो लोग हैं, जो यहां के अनधिकृत कही जाने वाली कॉलोनी में रहते हैं।

किसान: 2013 के विधानसभा में भाजपा को सबसे अधिक आउटर दिल्‍ली अर्थात देहाती दिल्‍ली में मिली थी। भूमि अधिग्रहण अधिनियम को लेकर मोदी ने बहुत बडी गलती की। उन्‍हें इसे संसद के अंदर पेश करना चाहिए था ताकि बहस के जरिए जनता यह जान पाती कि वह किस उददेश्‍य से यह कानून लाने जा रहे हैं। लेकिन कैबिनेट के फैसले को थोपने, को आआपा यह समझाने में सफल रही कि किसानों की जमीन छीन कर कारपोरेट को देने के लिए मोदी सरकार जबरदस्‍त बिल ला रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्‍ली को गुजरात समझ कर भारी गलती की और अपने हिसाब से कानून पास कराना चाहा। गुजरात की पढी लिखी जनता और उत्‍तर भारत की कम पढी लिखी जनता में अंतर है, जिसे मोदी समझने में चूक गए। कैबिनेट का फैसला पर्दे के पीछे अडाणी-अंबानी को किसानों की जमीन देने के रूप में प्रचारित किया गया और आप देख लीजिए, दिल्‍ली देहात से भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। भूमि अधिग्रहण कानून के मामले में कैबिनेट का निर्णय लाकर मोदी बुरी तरह से फंस गए हैं और देश में जगह जगह आंदोलन को दावत दे बैठे हैं। संघ का किसान मजदूर संघ भी इस कारण से आक्रोशित है।

अल्‍पसंख्‍यक: पूरे मुस्लिम और इसाई समुदाय ने जिस तरह से दंगे का झूठा प्रचार किया, जिस तरह से हैदराबाद से लेकर उत्‍तर पूर्व से मुस्लिम और इसाई प्रचार के लिए आए और जिस तरह से उन्‍होंने कांग्रेस की जगह एकमुश्‍त भाजपा के खिलाफ वोट किया, वह भी नकारात्‍मक वोटिंग का ही परिणाम है।

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