बिहार की हार में भाजपा के खलनायक: विचारधारा के 'अर्जुनों' को भूल कर चलने का खामियाजा अभी कई और बिहार के रूप में सामने आ सकता है!

संदीप देव‬। कभी मोदी के मीडिया खासकर, सोशल मीडिया स्ट्रेटजिस्ट रहे प्रशांत किशोर ने Narendra Modi को छोड़कर नीतीश का दामन थाम लिया और नीतीश की जीत में उनके मीडिया मैनेजमेंट की एक बड़ी भूमिका है। PMO India मोदी-भाजपा ने जीत के बाद प्रशांत को भुला दिया, उन्हें कहीं सेट नहीं कर पाई और उन्होंने नीतीश का दामन थाम लिया। कांग्रेस से अपनों को सेट करने का गुण 16 माह बाद भी मोदी सरकार नहीं सीख पाई! परिणाम सामने है!

 

* किसी जमाने में मोदी की पहली जीवनी लिख कर उन्हें एलिट कल्चर के ड्राइंग में पहुँचाने वाले अंग्रेजी पत्रकार नीलांजन आज मोदी से खफा हैं और पंजाब चुनाव में ‪#‎AAP‬ को लाने की तैयारी उन्होंने 'सिक्ख' पुस्तक लिखकर कर दी है!

* Madhu Purnima Kishwar ने मोदी पर लगे कम्युनल दाग धोने के लिए कितना बड़ा तथ्यगत अभियान चलाया था। 16 माह बाद भी उन्हें सम्मानित पद नहीं मिला है। अमित शाह से आजतक के एक कार्यक्रम में उन्होंने विरोध भी जताया कि मोदी को सत्ता में लाने के लिए भाजपा के कार्यकर्ताओं के अलावा बहुत सारे लोगों ने काम किया था, जिन्हें आप लोगों ने भुला दिया है! Amit Shah के पास, 'देखेंगे' -कहने के अलावा कोई जवाब नहीं था। कल भी मधु ‪#‎MaechForIndia‬ रैली में शामिल थी। लेकिन कब तक? आखिर उन्हें सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिए?

* बरखा दत्त ने मोदी के खिलाफ सबसे ज्यादा अभियान चलाया, लेकिन आज मोदी सरकार के मंत्रालय में उनकी सीधी एंट्री है, वहीं विचारधारा वाले विद्वान पत्रकार अरुण शौरी साइड लगा दिए गए हैं!

* सुब्रहमनियन स्वामी ने मोदी के पक्ष में सबसे ज्यादा माहौल बनाया था, लेकिन 10 वीं फेल व चुनाव हारने वाले मंत्री बने हुए हैं और स्वामी आज भी जूझ रहे हैं!

* छोटी सी दिल्ली में जीत के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल ने अपने समर्थक बुद्धिजीवियों को मोटी सैलरी पर बैठाने से लेकर कई तरह के फायदे दिए। आशीष खेतान, राघव आदि 1 से डेढ लाख ₹ हर माह वेतन ले रहे हैं। आशुतोष विदेश घूम रहा है। दूसरी ओर 16 माह होने के बाद भी भाजपा समर्थक पत्रकार सड़क पर हैं और कांग्रेसी पत्रकार DD news, PTI, लोकसभा, राज्यसभा चैनलों में बरकरार हैं!


* सोचिए एक प्रशांत किशोर ने विपक्ष से हाथ मिला लिया, तो बिहार में इनकी दुर्गति हो गयी, यदि हजारों निस्वार्थ राष्ट्रवादी, वैचारिक बुद्धिजीवियों की अवहेलना देखकर अपने की-बोर्ड को विराम दे दें तो मोटी सैलरी पर बैठे BJP के IT सेल वाले कांग्रेसी-वामपंथियों का कितना मुकाबला कर पाएंगे?

* कांग्रेसी बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार लौटाने का खेल कर और कांग्रेसी पत्रकारों ने दादरी को बिहार पर थोप कर इतना तो ‪#‎BJP‬-संघ-मोदी-अमित शाह को बता ही दिया कि यदि वे अपने विचारधारा के बुद्धिजीवियों को इसी तरह इग्नोर करते रहे तो फिर 2019 में और न जाने कितने प्रशांत किशोर आपको झटका देने के लिए निकल आएंगे! समय है चेत जाओ! यह विचारधारा की लड़ाई है और इसमें विचारधारा के 'अर्जुनों' को भूल कर चलने का खामियाजा अभी, कई और बिहार के रूप में सामने आ सकता है! ‪

#‎SandeepDeo‬ ‪#‎BiharElection

Web title: sandeep deo blog on ‬‎BiharElection 2015-4

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