बिहार की हार में भाजपा के खलनायक: संघ प्रमुख मोहन भागवत ने लिखी भाजपा के हार की पटकथा!

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संदीप देव। बिहार चुनाव में भाजपा को हुए नुकसान में संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान की भूमिका आज चर्चा का विषय है। लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है कि इस बयान के कारण पिछडी जातियों को भाजपा के खिलाफ गोलबंद कर दिया और मुसलमानों के एकमुश्त वोट ने इसमें नया ताकत दे दिया। बिहार में घोर जातिवादी लालू यादव आज यदि सबसे बडे खिलाडी के रूप में उभरे हैं तो आरक्षणवादी राजनीति के कारण ही। आज जब आरक्षण की राजनीति एकदम से अप्रासंगिक लग रही थी तो बिहार चुनाव से ठीक पहले भागवत जी के बयान ने उसे न केवल ऑक्सीजन दिया, बल्कि उसे ऐसा जिंदा किया कि भाजपा पिछले चुनाव के मुकाबले और भी नीचे चलती चली गयी।

 

संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान से हुए नुकसान से कोई इंकार नहीं कर सकता है। जो स्वयंसेवक मीडिया पर अपना खीझ निकाल रहे हैं, वो जरा दिमाग ठंडा रखकर सोचें। किसी बाहरी मीडिया को उन्होंने यह बयान नहीं दिया था और न ही किसी बाहरी मीडिया ने उनके किसी भाषण के अंश को निकाल कर तोडा-मरोडा। मोहन भागवत जी ने संघ के मुख्यपत्रा ऑर्गेनाइजर को यह साक्षात्कार दिया था। ठीक से पढिए, हां ‘ऑर्गेनाइजर‘ को। और हां, मैंने गुरु गोलवलकर की बायोग्रापफी लिखी है, स्वयंसेवक नहीं हूं इसलिए चीजों को निरपेक्ष ढंग से देख सका हूं कि संघ कोई भी काम बिना किसी कारण के नहीं करता है।

संघ पर आरोप लगता है कि 1942 के आंदोलन में उसने हिस्सा नहीं लिया। दरअसल बहुत सोच-समझ कर गुरुजी ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था। वह जानते थे कि आंदोलन शुरु होने से पहले ही फेल हो गया है, क्योंकि सुभाषचंद्र बोस को मात देने के लिए महात्मा गांध्ी ने आनन-पफानन में यह आंदोलन शुरु किया था और रातों-रात सभी कांग्रेस नेता गिरपफतार कर लिए गए थे। संघ की शक्ति को जाया करने की जगह गुरुजी ने वेट एंड वाच की पॉलिसी अपनाई थी।

ऐसे एक नहीं कई उदाहरण है। इसलिए साफ तौर पर कह सकता हूं कि संघ और वह भी संघ प्रमुख ने बिना वजह, घोर जातिवादी बिहार चुनाव से ठीक पहले और वह भी अपने मुखपत्र में आरक्षण को लेकर साक्षात्कार नहीं दिया होगा! कहीं न कहीं संघ और भाजपा का नेतृत्व टकरा रहा है!

सोचिए, इस बयान से पहले महागठबंधन के पास भाजपा के खिलापफ एक भी मुददा नहीं था और भागवत जी के इस बयान के बाद एकाएक भाजपा को आरक्षण विरोधी साबित करने का ब्रहमास्त्र नीतीश-लालू को मिल गया। उसके बाद प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी के बयान देखिए- मर जाउगा, लेकिन आरक्षण में बदलाव नहीं होगा, नीतीश दलितों में से 5 फीसदी आरक्षण लेकर संप्रदाय विशेष को देना चाहते हैं आदि। अर्थात मोदी सहित पूरे भाजपा को यह अहसास हो चुका था कि भागवत जी ने भयंकर नुकसान कर दिया है, लेकिन चूंकि वह मातृसंगठन आरएसएस के प्रमुख हैं, इसलिए उनकी आलोचना नहीं की जा सकती थी, इसलिए उनके बयान को बचाने और बिहार के आरक्षण वर्ग में शामिल मतदाताओं को बहलाने-दोनों स्तर पर प्रयास चलता रहा।

इसलिए समझ लीजिए, उपर स्तर पर संघ और मोदी-अमित शाह के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। सबकुछ विपक्षियों और मीडिया पर डालकर बचाव का रास्ता है तो बहुत आसान, लेकिन इससे सुधार की राह नहीं निकलती! सुधार की राह तो स्वस्थ्य आलोचना से ही निकलती है।

विचारधारा के स्‍तर पर आप किसी के भी समर्थक हो सकते हैं। यह लोकतंत्र में मतदान के हिसाब से भी जरूरी है। लेकिन यदि सबकुछ साफ साफ समझना हो तो वहां अपने पूर्वग्रह छोड़ने पड़ते हैं। बिहार चुनाव के ठीक पहले अपनी ही पत्रिका को संघ प्रमुख मोहन भागवत जी द्वारा 'आरक्षण समीक्षा' को लेकर साक्षात्‍कार देना, उसे प्रेस रिलीज के रूप में एएनआई, पीटीआई व वार्ता को भेजना, चुनाव के बीच में गोरखपुर व मंडी में फिर से इसी बयान को दोहराने के कारण घोर जातिवादी बिहार में लालू-नीतीश को बैठे बिठाए भाजपा को घेर कर पूरे चुनाव को अगडा बनाम पिछडा बनाने का मौका मिला और सभी पिछडी व दलित जातियां लालू के पक्ष में गोलबंद हो गयीं। मंडलराज-2 की लालू की घोषणा को न सुनने वाला शुतुर्मुर्ग ही हो सकता है।

अब संघ के महासचिव स्‍तर के पदाधिकारी कृष्‍णगोपाल जी ने एक बयान दिया है कि बिहार में भाजपा अपने शीर्ष नेतृत्व के अहंकार के कारण पराजित हुई। यह सब दर्शाता है कि बिहार चुनाव से पहले भाजपा-संघ का शीर्ष नेतृत्‍व कहीं न कहीं टकरा तो रहा ही था, जिसका खामियाजा बिहार चुनाव में भाजपा को भुगतना पड़ा। भाजपा व संघ शीर्ष नेतृत्‍व जितनी जल्‍दी सबकुछ ठीक कर ले, उतना अच्‍छा है। क्‍योंकि उन दोनों की लडाई में हिंदुत्‍व कमजोर और जातिवादी राजनीति मजबूत हुई है और बिहार चुनाव परिणाम इसका जीता-जागता उदाहरण है। भाजपा-संघ की लड़ाई में उन राष्‍ट्रवादियों की हार हुई, जो इन दोनों के सक्रिय सदस्‍य तो नहीं हैं, लेकिन जिन्‍होंने देशहित में नरेंद्र मोदी, राष्‍ट्रवाद व हिंदुत्‍व के लिए अपना सबकुछ झोंक दिया।

और आखिर में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को हराने वाले अनजान से राजद के सूबेदार दास ने जो कहा है, उससे संघ वाले सुने या न सुनें, लेकिन वह एक ऐसा सच है, जो बार-बार यह बताता रहेगा कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहीं न कहीं बिहार में भाजपा के हार की पूरी पटकथा लिखी। उनके ही कारण बिहार में पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित व महादलित को महागठबंधन के पीछे लामबंदी व भाजपा के खिलाफ ले जाने की वजह बना।

सूबेदार दास ने चुनाव परिणाम आने से पूर्व ही बीबीसी से बात-चीत में कहा था कि " आरक्षण के सवाल पर मोहन भागवत के बयान का उन्हें राजनीतिक फायदा मिलता दिख रहा है."

संघ के एक दलित बिहारी स्वयंसेवक का अभी फोन आया, संदीप जी हमारी संख्या के कारण तो हिन्दू होने की बात करते हैं और हमारे आरक्षण की हत्या समीक्षा कर करेंगे, यह हम कैसे होने दे सकते थे?

मेरे फेसबुक के एक पोस्ट में भी एक दलित स्वयंसेवक का कमेंट कुछ ऐसा ही है! सूबेदार दास, फेसबुक का कमेन्ट व अभी -अभी मेरे पास बिहारी दलित संघी का आया फोन- तीनों बिहार में भाजपा की हार में नागपुर के उस मुख्यालय की ओर ही इशारा है, जिन्होंने जातिवादी बिहार चुनाव के ठीक पहले अपनी मीडिया के जरिए एक ऐसा संदेश जाने-अनजाने दे दिया, जो बिहार में आज भाजपा की दुर्गति का प्रमुख कारण बना!

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Web Title: sandeep deo blog on ‬‎BiharElection 2015-5