संघ के बिना अमित, क्‍या बन पाएंगे भाजपा के असली 'शाह'!

संदीप देव, नई दिल्‍लीलोकसभा चुनाव में जाति व धर्म में बंटे उत्‍तरप्रदेश के 'कुरुक्षेत्र' को पूर्ण रूप से जीतने के बाद अमित शाह भाजपा के नए 'शाह' बन गए हैं, जिसका ईनाम उन्‍हें पार्टी अध्‍यक्ष की कुर्सी के रूप में मिला है। यह जगजाहिर है कि अमित शाह की इस ताजपोशी के पीछे स्‍वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। अमित शाह नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ माने जाते रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की पहली चुनौती यूपीए सरकार की गलती से बचना था, जो सत्‍ता के दो केंद्र के कारण अराजकता, अव्‍यवस्‍था और निर्णयहीनता की शिकार हो कर बुरी तरह से पराजित हुई थी। मोदी जानते थे कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) या फिर भाजपा के बुजुर्ग नेताओं में से यदि किसी के भी पसंद का व्‍यक्ति भाजपा का अध्‍यक्ष बनता है तो सरकार और संगठन के बीच जब-तब टकराव की स्थिति उत्‍पन्‍न होती रहेगी, जो और कुछ नहीं तो मीडिया और जनता के बीच मोदी सरकार की उपहासात्‍मक स्थिति उत्‍पन्‍न करने का ही काम करेगी!

चूंकि भाजपा में एक व्‍यक्ति एक पद की परिपाटी है, इसलिए नरेंद्र मोदी खुद पार्टी अध्‍यक्ष नहीं बन सकते थे। उन्‍होंने इसके लिए अपने सबसे विश्‍वस्‍त अमित शाह के नाम को आगे बढ़ाया और आरएसएस व भाजपा के बुजुर्ग नेताओं के किंतु-परंतु को दरकिनार कर उन्‍हें भाजपा का अध्‍यक्ष बनवा दिया। अध्‍यक्ष बनने के बावजूद अमित शाह के प्रति आरएसएस की बेरुखी तत्‍काल देखने को मिल गयी। अध्‍यक्ष बनने के बाद 'नागपुर' का आशीर्वाद (संघ मुख्‍यालय) लेने गए शाह को सरसंघसंचालक मोहन भागवत ने दो टूक कह दिया कि संघ भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में मदद नहीं करेगी। उन्‍हें अपने बूते ही संगठन भी खड़ा करना होगा और लोकसभा में मिली ऐतिहासिक जीत को दोहराना भी होगा।

संघ इतने पर ही नहीं माना, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 10 अगस्‍त को उड़ीसा के भुवनेश्‍वर में एक कार्यक्रम में सार्वजनिक मंच से दिए अपने एक बयान में यह तक कह दिया कि लोकसभा चुनाव में किसी एक व्‍यक्ति की वजह से नहीं, बल्कि जनता की वजह से जीत मिली है। मोहन भागवत ने कहा, जो लोग यह समझ रहे हैं कि किसी एक व्‍यक्ति के कारण यह सरकार बनी है, वह गलतफहमी में हैं। दरअसल यह सरकार जनता की वजह से बनी है, क्‍योंकि जनता बदलाव चाहती थी। भागवत ने कहा कि इससे पहले के चुनावों में भी यही पार्टी और लोग थे, लेकिन ऐसा बदलाव संभव नहीं हो सका। इससे ठीक एक दिन पहले 9 अगस्‍त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा की राष्‍ट्रीय परिषद की बैठक में अमित शाह की ताजपोशी के बाद लोकसभा चुनाव-2014 की जीत के लिए अमित शाह को ‘मैन ऑफ द मैच’ के खिताब से नवाजा था।

अमित शाह को तो छोडि़ए, संघ नरेंद्र मोदी को भी इस अप्रत्‍याशित जीत का पूरा श्रेय देने से बचता रहा है! संघ का तर्क है कि संघ व्‍यक्ति नहीं, विचारधारा आधारित संगठन है। दूसरी तरफ जमीनी सच्‍चाई इसके एकदम से उलट नजर आती है। कार्यालय में काम करने वाले लोगों से लेकर राह चलती जनता और घरेलू महिलाएं, किसी से भी पूछने पर न तो कोई संघ का नाम लेता है और न ही भाजपा का, हर व्‍यक्ति की ओर से यही आवाज आती है कि उसने 'नरेद्र मोदी' को वोट दिया है! इस पहलू का एक सच यह भी है कि संघ की स्‍थापना 28 सितंबर 1925 को, जनसंघ की स्‍थापना 1951 में और जनसंघ का विलय कर भारतीय जनता पार्टी की स्‍थापना 1980 में हुई थी, इसके बावजूद संघ की विचारधारा वाली पूर्ण बहुमत की सरकार वर्ष 2014 में जाकर बन पाई है! अब सवाल उठता है कि यदि विचारधारा इतनी ही ग्राह्य और संगठन इतना ही मजबूत था तो जनता का विश्‍वास हासिल करने में संघ को 89 साल और भाजपा को 34 साल क्‍यों लग गया? जनता इससे पहले भी तो कांग्रेस केे खिलाफ बड़े बदलाव के लिए दो बार आंदोलनरत हुई थी, लेकिन कभी भी भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं दिया था ! 

स्‍पष्‍ट है कि पार्टी अध्‍यक्ष के लिए संघ की पहली पसंद कभी भी अमित शाह नहीं रहे हैं, इसलिए संघ प्रमुख तक सार्वजनिक मंच से लगातार ऐसी बातें कह रहे हैं, जो पहले संघ की ओर से कभी नहीं कहा जाता रहा है। ऐसे हालात में अमित शाह के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती संघ के संगठन और कार्यकर्ताओं के बगैर भाजपा को न केवल जीत दिलाना है, बल्कि राष्‍ट्रीय पार्टी के रूप में पूर्वी और दक्षिण भारत में भाजपा का वृहत विस्‍तार करना भी है!

आखिर कौन हैं ये अमित शाह?
आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि अपने जीवन में छोटे-बड़े अब तक 42 चुनाव अमित शाह ने लड़े है, लेकिन आज तक उन्‍हें एक भी चुनाव में पराजय का सामना नहीं करना पड़ा है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व जब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की दावेदारी वाला 'अश्‍वमेघ घोड़ा' दौड़ने के लिए तैयार था, तब उन्‍होंने सबसे अधिक सीटों और सबसे कठिन परिस्थितियों वाले उत्‍तरप्रदेश के लिए अपना 'सारथी' अमित शाह को ही नियुक्‍त किया। कहने को तो अमित शाह को भाजपा का महासचिव व उत्‍तरप्रदेश का प्रभारी बनाए जाने का निर्णय पार्टी के पूर्व अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह का था, लेकिन यह सभी जानते हैं कि इस निर्णय के पीछे केवल और केवल नरेंद्र मोदी थे। गुजरात में मुख्‍मंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने अमित शाह के काम को परखा था और उसके नतीजे को भी विजय के रूप में भोगा था इसलिए भारत के 'चक्रवर्ती सम्राट' बनने के अभियान में वह अपने 'मुख्‍य सारथी' के बिना भला कैसे चल सकते थे।

अमित शाह का जन्म 1964 में मुंबई में एक कारोबारी परिवार में हुआ था। उनके पिता अनिलचंद्र शाह एक संपन्न व्‍यावसायी थे। अमित शाह ने अहमदाबाद से बायोकेमस्ट्री में स्नातक किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनने से पूर्व अमित शाह ने स्टॉक ब्रोकर के रूप में काम किया था। अमित शाह की नरेंद्र मोदी से मुलाकात 1982 में हुई थी, जिसके चार साल बाद वर्ष 1986 में अमित शाह ने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्‍यता ले ली। वर्ष 1997 में वो पहली बार विधायक बने। वर्ष 2002 में भी सरखेज से अमित शाह विधायक चुने गए, जिसमें उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की। वर्ष 2007 में भी वे रिकॉर्ड मतों से जीतकर आये। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के दोबारा मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने अमित शाह को अपने मंत्रीमंडल में गृह राज्यमंत्री बनाया था।

अमित शाह के चयन का आधार
लोकसभा 2014 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के सूत्रधार अमित शाह को भाजपा की कमान दी गई है। लोकसभा चुनाव में मोदी के 272 प्लस मिशन को कामयाब बनाने में अमित शाह ने शानदार भूमिका निभाई। शाह ने उत्तर प्रदेश में पहुंच कर पहले मोदी लहर को उत्‍पन्‍न किया और उसके बाद जातीय समीकरणों को ध्‍वस्‍त कर 80 सीटों वाले प्रदेश में भाजपा को 71 सीटों पर जीत दिलवा दी। दो अन्‍य सीट भी भाजपा के सहयोगी अनुप्रिया पटेल के 'अपना दल' को मिला। जिन सात अन्‍य सीटों पर दूसरे दल को जीत मिली, उसमें से पांच मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्‍य और दो गांधी परिवार की सोनिया गांधी व राहुल गांधी हैं। अमित शाह के कुशल प्रबंधन और रणनीति की वजह से कांग्रेस, सपा और बसपा को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। कुछ वर्ष पूर्व तक उत्‍तरप्रदेश की सत्‍ता में रहने वाली बसपा तो अपना खाता भी इस लोकसभा चुनाव में नहीं खोल सकी।

आरएसएस की पसंद नहीं हैं अमितशाह!
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि अटल-आडवाणी युग की समाप्ति के बाद भाजपा के अध्‍यक्ष पद का निर्णय पर्दे के पीछे से आरएसएस ही लेता रहा है। वह चाहे महाराष्‍ट्र से नितिन गडकरी को बुलाकर भाजपा अध्‍यक्ष बनवाना हो या फिर नितिन गडकरी के दोबारा अध्‍यक्ष पद पर बनाए रखने के लिए भाजपा के संविधान में संशोधन करना हो, निर्णय संघ का ही रहा है। यह अलग बात है कि नितिन गडकरी भाजपा के ही एक दूसरे धड़े की राजनीति के शिकार हो गए और दोबारा अध्‍यक्ष बनने से चूक गए। बाद में संघ के निर्णय से ही राजनाथ सिंह को अध्‍यक्ष बनाया गया था। एक जानकारी के मुताबिक 'नागपुर' का चक्‍कर लगाने वालों में नितिन गडकरी के बाद सबसे बड़ा नाम राजनाथ सिंह का ही था। वैसे नागपुर तो नितिन गडकरी की कर्मभूमि ही रहा है और इस बार वह वहां से लोकसभा चुनाव जीतकर भी आए हैं, लेकिन उत्‍तर प्रदेश के राजनाथ सिंह का नागपुर प्रेम का ही नतीजा है कि राजनाथ सिंह दो बार भाजपा के अध्‍यक्ष बन चुके हैं।  

राजनाथ सिंह के नरेंद्र मोदी के मंत्रीमंडल में शामिल होने के बाद 'एक व्‍यक्ति-एक पद' की अवधारणा पर चलते हुए राजनाथ सिंह का इस्‍तीफा जरूरी था। इस बीच संघ ने भाजपा अध्‍यक्ष के रूप में जेपी नड्डा और ओम माथुर का नाम आगे बढ़ाया। शुरुआती रेस के बाद ओम माथुर का नाम हट गया और संघ ने जेपी नड्डा के नाम पर आखिरी मुहर लगा दी थी। नड्डा जितने करीबी संघ के थे, उतने ही करीबी वह लालकृष्‍ण आडवाणी के भी थे। नड्डा के अध्‍यक्ष बनने के बाद संघ या फिर आडवाणी गिरोह सत्‍ता के दूसरे केंद्र के रूप में उभर सकती थी और मोदी सरकार के निर्णय को प्रभावित करने के लिए दबाव की राजनीति अपना सकती थी, इसलिए नरेंद्र मोदी ने अमित शाह से बात की और उनका नाम अध्‍यक्ष के रूप में आगे बढ़ा दिया।

सूत्र बताते हैं कि नरेंद्र मोदी ने अमित शाह से पूछकर उनकी मंजूरी हासिल कर ली थी। अमित शाह का नाम आगे बढ़ाते ही संघ व भाजपा के अंदर बेचैनी बढ़ने लगी और यह कह कर अमित शाह का विरोध किया जाने लगा कि एक ही प्रदेश गुजरात से प्रधानमंत्री व पार्टी अध्‍यक्ष का होना, देश की जनता को गलत संदेश दे सकता है।

संघ आखिरी समय तक अमित शाह को अध्‍यक्ष बनने से रोकने की कोशिश करता रहा। एक जुलाई से 8 जुलाई तक मध्य प्रदेश के धार जिले के जैन तीर्थस्थल के केंद्र मोहनखेड़ा में हुए संघ के चिंतन शिविर में भी 'एक प्रदेश (गुजरात) से एक ही पद' कह कर अमित शाह का विरोध किया गया, लेकिन जब संघ को लगा कि नरेंद्र मोदी अमित शाह के अलावा किसी अन्‍य नाम पर राजी नहीं हैं तो संघ ने मन मसोस कर उनके नाम को हरी झंडी दिखा दी। लेकिन 'चेक एंड बैलेंस' के तहत संघ के पूर्व प्रवक्‍ता राम माधव और कार्यकर्ता शिव प्रकाश को भाजपा में शामिल करा दिया गया।

वैसे कहने को तो इन दोनों का काम पार्टी और सरकार के बीच तालमेल बैठाना है, लेकिन सच यह है कि इन दोनों के जरिए संघ पार्टी संगठन के अंदर चल रही गतिविधियों से लगातार रूबरू होते रहना और संगठन पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है। संघ नहीं चाहता कि सरकार और पार्टी पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के अनुरूप चले। यही वजह है कि अध्‍यक्ष बनने के बाद अमितशाह जब आशीर्वाद लेने पहुंचे तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने उनसे स्‍पष्‍ट कह दिया कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा संघ कार्यकर्ताओं से सहयोग की उम्‍मीद पालने की जगह, खुद के बल पर जीत हासिल करे। संघ ने एक तरह से यह चुनौती अमित शाह के समक्ष रखा है कि वो बिना संघ के विजेता बनकर दिखाएं तभी संघ उन्‍हें वास्‍तविक विजेता मानेगा। मोहन भागवत व अमित शाह के बीच हुई इस बैठक में संघ के दूसरे नंबर के नेता मैया जी जोशी भी मौजूद थे।

अमित शाह की सफलता का राज और उनकी कार्यशैली
अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि उनकी कार्यशैली किसी तानाशाह की भांति है। न चापलूसी, न चमचागिरी-वह केवल काम देखते हैं। पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं को हड़काने में भी वह नहीं चूकते। वहीं पार्टी के छोटे से छोटे कार्यकर्ताओं की बात को भी वह गंभीरता से सुनते हैं, जिस कारण वरिष्‍ठ नेताओं की शिकायतें भी उन तक सीधी पहुंचती है।

उत्‍तरप्रदेश के भाजपा के एक वरिष्‍ठ पदाधिकारी के अनुसार, चुनाव से पूर्व अमित शाह उप्र के सभी जिले में गए और वहां रुककर कई रातें गुजारी। वह पहले एक बंद कमरे में उस जिले के पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं से मिलते थे, फिर उन्‍हें बाहर कर पार्टी कार्यकर्ताओं से बंद कमरे में बातें करते थे और बाद में नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक साथ बैठाकर कार्यकर्ताओं से स्‍पष्‍ट रूप से कहते थे कि आपने जो अभी थोड़ी देर पहले बंद कमरे में नेताओं के बारे में कहा है, वह अब इनके समक्ष भी कहिए। आमने-सामने की इस प्रत्‍यक्ष बैठक ने पारदर्शिता का काम किया और आपसी विवादों व शिकायतों का निपटारा होने लगा।

बाद में वह नेताओं व कार्यकर्ताओं को क्षेत्र की जनता के समक्ष उपस्थित करते और उनसे पूछते थे कि आप बताइए, इनमें से कौन-कौन आपसे मिलता है व आपकी शिकायतें सुनता है और कौन-कौन नहीं। इसके बाद वह सीधे अपना निजी मोबाइल नंबर जनता व कार्यकर्ता को देते थे और स्‍पष्‍ट कहते थे कि समस्‍या होने पर सीधे मुझसे बात करें। इससे जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं में सीधे विश्‍वास का संचार हुआ कि एक ऐसा भी नेता है जो अपने वरिष्‍ठ नेताओं से अधिक उनकी सुनता है।

अमित शाह की सफलता का दूसरा राज उत्‍तरप्रदेश की जनता का गुजरात की जनता से सीधे अंत:संबंध स्‍थापित करना रहा। उप्र के दलित व पिछड़ी जातियों और अल्‍पसंयक समुदाय के लोगों को बस में बैठाकर गुजरात में भेजा जाता था और वहां प्रभावी के रूप में कार्यरत उनके समुदाय के लोगों से मिलवाया जाता था। उदाहरण के लिए उप्र के बुनकर को गुजरात के बुनकर के पास भेजा गया और उनसे बातचीत करवाया गया। गुजरात के बुनकरों का रहन-सहन, उनकी आमदनी को देखकर उप्र का बुनकर यह सोचने को बाध्‍य हुआ कि एक ही देश में एक ही जैसे काम करने के बावजूद गुजरात और उप्र के लोगों के जीवनशैली और आमदनी में कितना फर्क है। इस शैली के कारण बड़ी संख्‍या में पिछड़े, दलित और शिया, सूफी व गरीब मुसलमानों ने उप्र में भाजपा को वोट दिया और भाजपा 80 में से 73 सीट जीतने में सफल रही।

अमित शाह ने इसके उलट भी किया। गुजरात के पिछड़े, दलित और मुस्लिम समुदाय के लोगों को लगातार उत्‍तरप्रदेश में बुलाया और यहां के उन्‍हीं के समुदाय के लोगों के बीच उन्‍हें भेजा, जिससे वो एक-दूसरे की वास्‍तविक जीवनशैली से परिचित हो पाए।
अमित शाह ने तीसरी रणनीति के तहत 450 से अधिक भाजपा की प्रचारात्‍मक वैन चलवाई। यह वैन उन गांवों और दूर-दराज के इलाकों में जाती थी, जहां अभी तक न बिजली पहुंची है, न टेलीविजन चैनल पहुंचा है और न ही अखबार ही जाता है। गुजरात मॉडल की चर्चा करता यह वैन हरके गांव के प्रत्‍येक लोगों के सीधा संपर्क में आता गया और लोगों को यह समझाता गया कि जहां गुजरात में 24 घंटे बिजली मिलती है, वहां आजादी के 60 साल बाद भी आपको बिजली नहीं मिल रही है, जिसके कारण आप विकास से महरूम हैं।

इन प्रचार वैन के कारण नरेंद्र मोदी के प्रति फैलाए जा रहे हर झूठ को जनता से सीधा संवाद स्‍थापित करते हुए तोड़ दिया गया और भाजपा उन क्षेत्रों में भी विजय हासिल करने में सफल हो गई, जहां से आज तक नहीं जीती थी। अमित शाह ने एक तरह से अपनी कार्यशैली से उत्‍तरप्रदेश में नरेंद्र मोदी की लहर को पैदा किया और बाद में उसे वोटों में तब्‍दली कर दिया। यही उनकी सफलता की वास्‍तविक वजह है।

अमित शाह के समक्ष चुनौतियां
नरेंद्र मोदी के कारण अमित शाह भाजपा के अध्‍यक्ष बन तो गए, लेकिन उनके समक्ष चुनौतियों का अंबार है। उनके समक्ष पहली चुनौती तो पार्टी एवं संघ के नाराज नेताओं को साथ लेकर चलने की है। सुषमा स्‍वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह जैसे नरेंद्र मोदी विरोधी नेताओं को तो सरकार में शामिल कर नरेंद्र मोदी ने काम में उलझा दिया है, लेकिन पूरी तरह से खाली हो चुके लालकृष्‍ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, बिहार से आने वाले सुशील मोदी, वरुण गांधी, प्रभात झा आदि एवं मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पार्टी के अंदर एक असंतुष्‍ट गुट का निर्माण कर लिया है। इस गुट को संघ के कुछ नेताओं जैसे सुरेश सोनी का खास प्रश्रय प्राप्‍त है। पार्टी में नए युवाओं को आगे लाने और इस असंतुष्‍ट गुट को साथ लेकर चलना अमित शाह के लिए सबसे पहली और बड़ी चुनौती है।

अमित शाह की दूसरी चुनौती, आगामी समय में कुछ राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भाजपा को विजयी बना बनाना है। इसमें महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, केरल, जम्मू-कश्मीर और संभवत: दिल्ली जैसे राज्य है। इन राज्‍यों में उन्‍हें न केवल विरोधी पार्टी से निपटना है, बल्कि महाराष्‍ट्र के शिवसेना जैसे अपने क्षेत्रीय सहयोगियों से भी निपटना है, जो जब-तब भाजपा को घुड़की देती रहती है। हरियाणा में कई क्षत्रपों के कारण चुनाव बहुकोणीय दिख रहा है। इससे भी उन्‍हें पार पाना होगा। इसके अलावा दिल्‍ली में अल्‍पमत की सरकार बनाने या चुनाव कराने जैसे विकल्‍पों पर विचार करते हुए नई उभरी अरविंद केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' से भी पार पाना है, जो हरियाणा के चुनाव में उतरने के लिए भी ताल ठोंक रही है।

अमित शाह के लिए तीसरी बड़ी चुनौती, बिना संघ की सहायता से भाजपा का विस्‍तार पूर्व में पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर, मेघालय से लेकर दक्षिण में तमिलनाडु तक करने की है। अमित शाह को दिखाना होगा कि 'कांग्रेसीकरण' से जूझती भाजपा सचमुच एक कैडर आधारित पार्टी है, जिसमें संघ के कार्यकर्ता अतिरिक्‍त बल तो पैदा करते हैं, लेकिन उनके बिना भी पार्टी मंझधार से बाहर निकलने की कूबत रखती है। सरसंघसंचालक मोहन भागवत के द्वारा दो टूक कहे गए वाक्‍य को आशीर्वाद के साथ-साथ चुनौती मानकर चलने में ही अमित शाह के संगठनिक कौशल का वास्‍तविक प्रदर्शन है।

अमित शाह की चौथी बड़ी चुनौती मोदी सरकार को संकट से उबारना भी है, खासकर राज्‍यसभा में उत्‍पन्‍न संकट से। लोकसभा में प्रचंड बहुमत वाली 'मोदी सरकार' राज्‍ससभा में अल्‍पमत में है। नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पीछे बैठे नेताजी मुलायम सिंह यादव को हाथ पकड़ कर अमित शाह जिस तरह से आगे बैठाने लाए थे, वह काफी महत्‍वपूर्ण है। इसका परिणाम भी दिखा। ट्राई बिल के संशोधन में राज्‍यसभा में इन्‍हीं नेताजी की पार्टी ने एनडीए सरकार के पक्ष में अपना समर्थन दिया। अमित शाह के समक्ष भाजपा के सहयोगी दलों को अपने साथ हर मुद्दे पर जहां साथ जोड़े रखने की चुनौती है, वहीं राज्‍यसभा में अल्‍पमत वाली इस सरकार के लिए लगातार नए सहयोगियों का समर्थन जुटाना भी है।

अमित शाह की पांचवी बड़ी चुनौती, राम मंदिर, समान आचार संहिता और कश्‍मीर से धारा-370 समाप्‍त करने को लेकर देश में एक जन जागरूकता का माहौल तैयार करना, इसके प्रति मुसलमानों को विश्‍वास में लेना और जनता से सीधे संवाद के अपने तरीके के जरिए इन्‍हें देश में लागू कराने का वातावरण निर्मित करना भी है ताकि मोदी सरकार जब इसके लिए कदम बढ़ाए तो देश पहले से आश्‍वस्‍त हो। अमित शाह को नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा यदि कांग्रेस से अलग है तो मूल में उसके यही तीन मुद्दे हैं। इसके बिना भाजपा और कांग्रेस के किसी नीति में शायद ही कोई अंतर है।

निष्‍कर्ष:
अमित शाह के अध्‍यक्ष बनते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अमित भाई की अपनी कार्यक्षमता है और वह उसकी ही बदौलत यहां तक पहुंचे हैं। वहीं गृहमंत्री भाजपा के पूर्व अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि अमित शाह के व्यक्तित्व का मजबूत पक्ष यह है कि वे एक ऐसे क्षमतावान व्यक्ति हैं, जिनमें संगठन और नेतृत्व की अद्भुत क्षमता है। उनके अंदर वह कौशल है, जो उन्हें नयी योजनाओं को संपूर्ण करने का सामर्थ्य प्रदान करता है। अब देखना यह है कि अपनी कार्यक्षमता और कौशल के बदौलत अमित शाह भविष्‍य में आने वाली इन चुनौतियेां से पार पाकर कैसे भाजपा के क्षितिज को विस्‍तार दे पाते हैं।

Web title: BJP's 2014 win wasn't one-man show, RSS chief Mohan Bhagwat  

Keywords: अमित शाह| नरेंद्र मोदी| संघ| आरएसएस| राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ| भाजपा| भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह| मोहन भागवत| Mohan Bhagwat| Narendra Modi| BJP| NDA| Politics| modi sarkar| amit saha| Rashtriya Swayamsevak Sangh|Narendra Modi|Mohan Bhagwat|Modi Wave|BJP 2014 Win






Arun Jaitley साहब अब बस भी कीजिए! मोदी स...
Arun Jaitley साहब अब बस भी कीजिए! मोदी सरकार को बदनाम करने वालों को पुरस्‍कृत करने का यह खेल क्‍यों?

संदीप देव।पमें Narendra Modi सुनामी में भी जीतने की क्षमता नहीं रही, इसलिए शायद आप हम मतदाताओं एवं अपनी ही सरकार के सम्मान से [...]

अमेरिकन व स्‍केनडिनेवियन ग्रीनपीस एनजीओ ...
अमेरिकन व स्‍केनडिनेवियन ग्रीनपीस एनजीओ और अरविंद केजरीवाल के रिश्‍ते को समझिए!

संदीप देव।न और स्‍केनडिनेवियन (नार्वे, स्‍वीडन, डेनमार्क) की एनजीओ 'ग्रीनपीस' की भारत में पदाधिकारी प्रीया पिल्‍लई को लंदन जाने के क्रम में दिल्‍ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अडडे पर [...]

दिल्ली यूनिवर्सिटी की अदिति आर्या बनी मि...
दिल्ली यूनिवर्सिटी की अदिति आर्या बनी मिस इंडिया

दिल्ली यूनिवर्सिटी की अदिति आर्या इस साल की मिस इंडिया चुनी गई हैं। मुंबई स्थित यशराज स्टूडियो में हुई प्रतियोगिता में पहली रनर मुंबई की आफ्रीन रेचल वाज एवं दूसरी रनर अप लखनऊ के आईटी कॉलेज से पढ़ाई करने वाली [...]

मनु शर्मा व रामबहादुर राय, जिनके गले से ...
मनु शर्मा व रामबहादुर राय, जिनके गले से लगकर सम्‍मानित हुआ 'पद्मश्री'

संदीप देव। खुशी का दिन है। मेरे दो-दो आदर्श व आदरणीय साहित्‍यकार-पत्रकार को आज पद्म पुरस्‍कार मिल रहा है। इनमें एक हैं मनु शर्मा और दूसरे हैं रामबहादुर राय। सच पूछिए तो ये दोनों [...]

महिलाओं की माहवारी पर बीबीसी हिंदी की पे...
महिलाओं की माहवारी पर बीबीसी हिंदी की पेशकश: यहां होता है पहली माहवारी पर जश्न

सुशीला सिंह, बीबीसी संवाददाता।ी हो रही है. अनोखी इस मायने में कि असम की परंपरा के अनुसार यहां दुल्हन तो होती है लेकिन दूल्हा एक केले का पौधा [...]

पहली ही कोशिश में मंगल तक पहुंचने वाला प...
पहली ही कोशिश में मंगल तक पहुंचने वाला पहला देश बना भारत

बेंगलुरु। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत ने नायाब उपलब्धि हासिल की है। भारतीय अनुसंधान संस्थान (इसरो) का मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी मंगलयान सुबह 8 बजे करीब मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया। यह उपलब्धि हासिल [...]

पत्रकार-दलाल-नौकरशाह-कारपोरेट गठजोड़ पिछ...

संदीप देव।लय में पिछले कई वर्षों से जिस तरह जासूसी का खेल चल रहा था, उसका पर्दाफाश यह दर्शाता है कि मीडिया-दलाल-नौकरशाह-कंपनियों का नेक्‍सस किस तरह गहराई तक देश को घुन की तरह खा [...]

पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी होती हैं स्‍वप...
पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी होती हैं स्‍वप्‍नदोष की शिकार!

स्वप्नदोष का नाम सुनते ही शर्मिंदा हो जाने वाले पुरुष अब राहत की सांस ले सकते हैं. इस बीमारी के बारे में माना जाता रहा है कि यह सिर्फ पुरुषों को ही होता है. लेकिन अध्‍ययनों से पता [...]

दिल्‍ली में सुरक्षित नहीं है बचपन!...
दिल्‍ली में सुरक्षित नहीं है बचपन!

आधी आबादी ब्‍यूरो, नई दिल्ली। जंगल बनता जा रहा है। बच्चों के लिए खेलने के लिए जगह नहीं बची है। पार्क भी धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। अभिभावकों की [...]

नुक्‍कड़ नाटक के जरिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का संदे...
नुक्‍कड़ नाटक के जरिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का संदेश

दिल्‍ली।  कमल इंसटिट्यूट ऑफ हायर एडूकेशन के छात्र और छात्राओ ने 'बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ ' अभियान पर नुक्कड नाटक का आयोजन किया। 22 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र [...]

असहिष्णुता: मैं एक मुस्लिम महिला हूं, हिंदुओं के ब...
असहिष्णुता: मैं एक मुस्लिम महिला हूं, हिंदुओं के बीच रहती हूं, लेकिन मैंने कभी भारत में भेदभाव महसूस नहीं किया!

सोफिया रंगवाला। पेशे से डॉक्टर हूं। बंगलोर में मेरी एक हाइ एण्ड लेजर स्किन क्लिनिक है। मेरा परिवार कुवैत में रहता है। मैं भी कुवैत में पली बढ़ी हूं लेकिन 18 साल [...]

प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को मीडिया भले ही बदनाम कर...
प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को मीडिया भले ही बदनाम करे, सूचना प्रसारण मंत्री को तो क्रिकेट डिप्‍लोमेसी से ही फुर्सत नहीं है!

संदीप देव।उटलुक पत्रिका के एक गलत खबर के कारण जो हंगामा हुआ और सदन को स्‍थगित करना पड़ा, इसका जिम्‍मेवार कौन है? क्‍या मोदी सरकार मीडिया के इस तरह के गैरजिम्‍मेवार और सबूत [...]

Other Articles