महिलाओं की माहवारी पर बीबीसी हिंदी की पेशकश: सैनिटरी पैड बनाती थीं, अब पाथती हैं उपले

सीटू तिवारी पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए। बिहार के पटना के नज़दीक स्थित एक गाँव में सैनिटरी पैड बनाने का काम बंद हो जाने के बाद उससे जुड़ी महिलाएँ बेरोज़गार हो गई हैं. लेकिन काम बंद हो जाने के बावजूद इस काम ने गाँववालों और इस काम से जुड़े लोगों की सोच पर गहरा असर डाला है.

महिलाओं और गाँववालों के अंदर इस विषय को लेकर संकोच और शर्म कम हुई है. वहीं बिहार सरकार की लड़कियों को सैनिटरी पैड देने की प्रस्तावित योजना को लेकर सियासत शुरू हो गई है. बिहार की राजधानी पटना से सटे फुलवारीशरीफ के नीरपुर गांव में धनवंती और हीरामनी बड़ी तेज़ी से गोबर के उपले बना रही हैं.

थोड़ा सुस्ताती हैं तो बताती हैं कि चार साल पहले वे सैनिटरी नैपकिन की पैकेजिंग करती थीं. आठ नैपकिन का एक पैकेट तैयार करने पर उन्हें 50 पैसे मिलते थे. अब वो काम बंद हो गया तो उपले बनाकर कुछ पैसे कमाती हैं.

धनवंती कहती हैं, "जब नैपकिन पहली बार देखा तो सब औरतें उसको छू–छू कर हंसती थी और जब भइया लोग (प्रशिक्षण देने वाले) पानी भरे गिलास में नैपकिन डुबोते थे तो लाज आती थी."

लेकिन दो महीने बीतते-बीतते शर्म का ये घेरा टूटने लगा. हीरामनी बताती है, "बाद में तो हम लोग जगह–जगह घूमते थे और दुकानदारों से पूछते थे पैड लीजिएगा. नैपकिन का काम करते हुए हमने मायके और ससुराल से बाहर की भी दुनिया देख ली."

मर्द बिचकाते थे मुँह

धनवंती और हीरामनी अकेली नहीं है. पछिया, छठिया, फूलो, सीता सभी इस कश्ती की सवार हैं. चालीस साल की फूलो देवी बताती हैं, "नैपकिन बनाने का काम सुनते ही मर्द ने मुँह बिचका लिया था और अब जब काम छूट गया तो बच्चे तक हंसी उड़ाते हैं."

ये औरतें फुलवारीशरीफ स्थित नई दिशा नाम की संस्था में सैनिटरी नैपकिन बनाती थीं. साल 2009 में महिला विकास निगम के सहयोग से ये काम शुरू हुआ था लेकिन एक साल बाद बंद हो गया. फुलवारी से पहले वैशाली के बिदुपुर गांव में सैनिटरी नैपकिन बनाने का ये प्रोजेक्ट 2006 से ही चल रहा था. प्रोजेक्ट बंद हो जाने के बाद भी इसकी वजह से आई जागरूकता ने गांव की तस्वीर बदली है.

ढाई दिन की माहवारी
37 वर्षीय सोना देवी बताती है कि जब उन्हें मासिक धर्म हुआ तो माँ ने छप्पर की घास को ढाई बार काटा ताकि मासिक स्राव ढाई दिन ही हो. सोना ख़ुद तो आज भी सूती कपड़े का ही इस्तेमाल करती है लेकिन अपनी बहुओं के लिए वो 'रूई का गद्दा' (पैड) ही बाज़ार से मंगवाती है.

12वीं तक पढ़ी चंदा को भी नैपकिन के बारे में तभी पता चला जब उसकी मां छठिया देवी ने सैनिटरी नैपकिन बनाना शुरू किया. चंदा अब 'चार खूंटे वाले' नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं. नई उम्र की लड़कियों और महिलाओं ने नैपकिन का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, लेकिन गांव में स्थित छोटी दुकानों में ये सामान नहीं मिलता.

ग्राहक नहीं आते

गांव के बीचोबीच उदय की दुकान है, जहां बिस्कुट, चिप्स, साबुन, तेल, शैम्पू सहित रोज़मर्रा की हर चीज उपलब्ध है, लेकिन सैनिटरी नैपकिन नहीं है. वजह पूछने पर उदय खीझते हुए कहते है, "जब इसके ग्राहक नहीं हैं तो हम रखेंगें क्यों." उदय के घर की औरतें भी कपड़े का ही इस्तेमाल करती हैं. नीरपुर से लगे हुए चिलबिल्ली गांव में 36 साल की सविता देवी भी दुकान चलाती हैं. उनके पति की पिछले साल डायरिया से मौत हो गई थी. नीरपुर और चिलबिल्ली में सविता की अकेली दुकान है जहां सैनिटरी पैड बिकते हैं. दुकान के बगल में माध्यमिक विद्यालय है, जहां की लड़कियां पैड खरीदती है जिससे 30-35 पैकेट हर महीने बिक जाता है.

नहीं जातीं स्कूल

सविता बताती हैं कि ग्राम वार्ता में जब माहवारी पर बात हुई तो पता चला कि कई औरतें कपड़े को आलू जैसा गोल बनाकर रक्तस्राव की जगह घुसा लेती है. चिलबिल्ली गांव के मध्य विद्यालय के टीचर विद्या शंकर प्रसाद बताते है कि लड़कियां हर महीने दो-तीन दिन स्कूल नहीं आती.

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनीसेफ ने भी वैशाली और नालंदा में स्कूली बच्चियों के बीच सर्वेक्षण कराया, जिससे मालूम चला कि 59 फ़ीसदी लड़कियां मासिक चक्र के दौरान स्कूल नहीं जाती. वहीं 96 फ़ीसदी लड़कियां गंदे कपड़े का ही इस्तेमाल करती हैं.

सैनिटरी पैड पर सियासत
दिलचस्प है कि सैनिटरी नैपकिन पर बिहार में सियासत तेज़ हो गई है. फ़रवरी, 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कक्षा सात से बारह तक की छात्राओं को अप्रैल से चार सैनिटरी नैपकिन देने की घोषणा की थी. इसका फ़ायदा 33 लाख से ज़्यादा लड़कियों को होने वाला था.

कैबिनेट ने इसके लिए 32.76 करोड़ का फंड भी मंजूर कर दिया था. लेकिन जब नौ महीने तक इस योजना पर अमल नहीं हो पाया तो राज्य में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इसे लफ्फाजी करार दे रही है.
उसके बाद आनन-फानन में राज्य के शिक्षा विभाग ने महिलाओं के 'महिला समाख्या और जीविका' को यह कार्यक्रम लागू करने की ज़िम्मेदारी दी है.

अभी कुछ तय नहीं है
हालांकि अभी तक कुछ ठोस तय नहीं हो पाया है. महिला समाख्या की राज्य कार्यक्रम निदेशक कीर्ति बताती हैं, "अभी तक कुछ तय नहीं हुआ है कि कैसे क्या करना है. इस पर अभी विभाग से बातचीत चल रही है, लेकिन इतना तय है कि जल्द ही ये योजना धरातल पर उतरेगी."

बहरहाल, नीरपुर की धनवंती और हीरामनी इंतजार कर रही हैं, न केवल अपने छूट गए रोज़गार को दोबारा हासिल करने का, बल्कि इसे बहाने घर से बाहर की भी दुनिया दोबारा देखने का.

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साभार: बीबीसी हिंदी
बीबीसी की ' हम गुनाहगार औरतें' श्रृंखला का मूल लिंक:

http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/women_issues_cluster_va

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