धर्म | दर्शन

कृष्‍ण ने अर्जुन से कहा, हे अर्जुन वृक्षों में मैं पीपल हूं। लेकिन आखिर पीपल ही क्‍यों?

संदीप देव। अश्‍वत्‍थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद: । भगवान श्रीकृष्‍ण ने गीता के 10 वें अध्‍याय में कहा है, हे अर्जुन वृक्षों में मैं पीपल हूं और देवर्षियों में नारद। कदम्‍ब के पेड़ के नीचे रास रचाने वाले श्रीकृष्‍ण ने खुद की उपमा आखिर पीपल से ही क्‍यों दी?
मैं भी सोचता था! मुझे इस सदी की सबसे बड़ी औपन्‍यासिक कृति देने वाले आदरणीय मनु शर्मा जी (उम्र 88 वर्ष) के सान्निध्‍य में काफी समय तक बनारस में रहने का अवसर प्राप्‍त हुआ। प्रभात प्रकाशन के लिए मैंने उनकी जीवनी लिखी है, जिसके संपादन का कार्य अभी चल रहा है। मनु शर्मा जी ने भगवान श्रीकृष्‍ण की आत्‍मकथा आठ खंडों में और करीब 3000 पृष्‍ठों में लिखी है, जो आधुनिक साहित्‍य में सबसे बड़ी कृति है। उन्‍होंने मुझे समझाया कि आखिर भगवान श्रीकृष्‍ण ने खुद को पीपल ही क्‍यों कहा:

Read more...

शंख, शंखनाथ और उसका महत्‍व

हिंदू मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह रत्नों में से एक शंख की उत्पत्ति छठे स्थान पर हुई। शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद हैं, जो अन्य तेरह रत्नों में हैं। दक्षिणावर्ती शंख के अद्भुत गुणों के कारण ही भगवान विष्णु ने उसे अपने हस्तकमल में धारण किया हुआ है।

Read more...

शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है, जो अज्ञान का नाश करता है

रामचरित मानस के अनुसार तारका नाम का एक असुर हुआ उसने सभी देवताओं को हराकर तीनों लोकों को जीत लिया। वह अमर था। इसीलिए देवता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। आखिर में सभी देवता उसके आतंक से परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे। तब ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि इस असुर का संहार सिर्फ शिव पुत्र के द्वारा ही हो सकता है। तब सभी देवता चिंतित हो गए क्योंकि सती के देह त्याग के बाद से शिव समाधि में बैठे थे। तब ब्रह्माजी बोले कि सती ने देह त्याग के बाद हिमाचल के यहां जन्म लिया है।

Read more...

आस्था का अद्भुत मेला महाकुंभ

राजेंद्र सिंह। महाकुंभ शुरू हो गया है। अपने उसी गौरवशाली इतिहास को समेटे। जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी और यहां तक कि राष्ट्र की सरहदें तक यहां खत्म हो जाती हैं। साधु-संत-राज-समाज-देसी-विदेशी, जो भी आता है आस्था के इस महापर्व में डूब जाता है। कुंभ पहुंचकर लगता है जैसे हम कभी भिन्न थे ही नहीं। दुनिया में पानी का इतना बड़ा मेला मैंने कहीं नहीं देखा। यह परंपरा हजारों बरस से बदस्तूर जारी है। कभी-कभी इसे लेकर मन में कई सवाल उठते हैं। जिज्ञासा होती है कि क्या यह एक पवित्र स्नान मात्र की आस्था है या इसकी पृष्ठभूमि में कुछ और भी प्रयोजन थे?

Read more...

शिव लिंग की उत्‍पत्ति और महिमा

शिवलिंग भगवान शंकर का प्रतीक है। शिव का अर्थ है - 'कल्याणकारी'। लिंग का अर्थ है - 'सृजन'। सर्जनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिन्ह के रूप में लिंग की पूजा होती है। स्कंद पुराण में लिंग का अर्थ लय लगाया गया है। लय ( प्रलय) के समय अग्नि में सब भस्म हो कर शिवलिंग में समा जाता है और सृष्टि के आदि में लिंग से सब प्रकट होता है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं।

Read more...