जेहादियों और कांग्रेसियों ने मिलकर जिंदा जलाया था 59 राम भक्तों को!

संदीप देव। कोई भी हिंदुस्तानी गोधरा की उस हृदयविदारक घटना को कैसे भूल सकता है, जिसमें 59 हिंदुओं को जिंदा जला कर मार दिया गया था? मरने वाले इन हिंदुओं में 25 महिलाएं, 19 पुरुष और 15 बच्चे शामिल थे। इन हिंदुओं का दोष केवल इतना था कि यह लोग राममंदिर निर्माण के लिए अयोध्या में आयोजित पूर्णाहूति महायज्ञ में भाग लेकर अपने घर लौट रहे थे। वैसे जब भी 2002 के गुजरात दंगे की बात होती है तो भारतीय मीडिया गोधरा की बात नहीं करती। वो ऐसा व्यवहार करती है जैसे कि गोधरा में कुछ हुआ ही नहीं था!

 

गोधरा में जलाए गए रामभक्तों को मीडिया ने कभी हिंदू नहीं लिखा, बल्कि कारसेवक या विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोग ही लिखती रही, लेकिन इसकी परिणति में गुजरात में जो दंगा भड़का उसमें मरने वालों के लिए यही मीडिया मुसलमानों का नरसंहार जैसे सांप्रदायिक शब्दों का लगातार प्रयोग करती रही। हालांकि जांच रिपोर्टों और अदालती फैसले से यह स्पष्ट हो चुका है कि गुजरात दंगा नरसंहार नहीं था, क्योंकि दंगा में मरने वालों में 30 फीसदी हिंदू भी शामिल थे।

गुजरात हाईकोर्ट द्वारा गठित नानावती कमीशन ने गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस जलाए जाने की घटना को ‘पूर्व नियोजित साजिश’ और ‘मुसलमान भीड़’ द्वारा ट्रेन पर हमला जैसे शब्द का प्रयोग किया तो कांग्रेस ने न केवल मीडिया के मार्फत इस सच्चाई को दबाने की कोशिश की, बल्कि नानावती कमीशन की रिपोर्ट को गुजरात विधानसभा में पेश करने में भी व्यवधान उत्पन्न किया।

यही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा संचालित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-एक में तत्कालीन रेलमंत्री लालू यादव ने तो गोधरा नरसंहार में शामिल कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को बचाने और ‘मुस्लिम वोट बैंक’ के लिए ‘बनर्जी कमेटी’ का गठन कर दिया। इस कमेटी का मकसद सिर्फ इतना था कि गोधरा में जलाए गए साबरमती एक्सप्रेस की घटना को एक दुर्घटना बता दिया जाए और इसमें संलिप्त स्थानीय मुसलिम समुदाय के जेहादियों व कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को पूरी तरह से बचा लिया जाए। बनर्जी कमेटी ने इस आशय की रिपोर्ट भी दी, जिसका कुल निष्कर्ष यह था कि साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 बोगी के अंदर से ही आग लगने की घटना हुई। यानी 59 रामभक्तों ने खुद को ही आग लगाकर एक तरह से सामूहिक आत्मदाह कर लिया! हिंदू समाज के लिए इससे बड़ी नृशंसतापूर्ण रिपोर्ट और उनके वजूद को मिटाने की बात और क्या हो सकती है?

बनर्जी कमेटी की रिपोर्ट एक तरह से पूरी कांग्रेस सरकार, अरुंधति राय जैसे वामपंथियों और तीस्ता शीतलवाड़ व शबनम हाशमी जैसे विदेशी फंड पर चलने वाले एनजीओ गैंग के उस झूठ पर मुहर लगाने के लिए बनी थी, जो गोधरा की घटना को कभी एक दुर्घटना तो कभी इसे हिंदू वोट बैंक तैयार करने के लिए भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-विश्व हिंदू परिषद की साजिश बता रही थी। यह पूरा गैंग इस घटना में शामिल कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय मुसलिम जेहादियों को बचाने का प्रयास कर रही थी, जिस पर गुजरात हाईकोर्ट व गोधरा पर निर्णय देने वाले फास्ट ट्रैक कोर्ट ने पानी फेर दिया।     

गुजरात हाईकोर्ट ने बनर्जी कमेटी को पूरी तरह से असंवैधानिक, अवैध और जांच को प्रभावित करने वाला करार दिया। वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को पूर्वनियोजित साजिश के तहत जलाया गया था।’ कोर्ट ने 59 रामभक्तों को जिंदा जलाने में जिन 31 लोगों को सजा सुनाई उन पर ‘साजिश रचने‘ और ‘हत्या’ का आरोप सिद्ध हुआ। इसमें से 11 को मौत की सजा और 20 को उम्रकैद की सजा हुई। मौत की सजा पाने वालों में कांग्रेस कार्यकर्ता व नगरपालिका सदस्य हाजी बिलाल भी शामिल है, जो न केवल दंगाईयों का नेतृत्व कर रहा था, बल्कि इस पूरी साजिश को रचने वालों में भी शामिल था। यही नहीं, साबरमती एक्सप्रेस की आग को बुझाने के लिए मौके पर पहुंची दमकल गाडि़यों को भी इसने ही रेलगाड़ी तक पहुंचने से रोका। गोधरा नरसंहार में शामिल कांग्रेसियों की पूरी संलिप्तता को दर्षाने से पहले आइए देखते हैं कि स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट यानी विशेष अदालत ने अपने निर्णय में क्या कहा...?

गोधरा पर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला
विशेष अदालत ने 25 फरवरी 2011 को गोधरा कांड पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने 94 आरोपियों में से 31 लोगों को दोषी पाया जबकि 63 को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। सजा पाने वाले सभी 31 अपराधी मुसलमान हैं। इनमें से 11 को सजा-ए-मौत तथा बाकी 20 को आजीवन कारावास की सजा मिली है। विशेष अदालत के जज पी. आर.पटेल ने जिन 11 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है, उनको साजिश रचकर 59 कारसेवकों की हत्या करने का दोषी माना और इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ अपराध करार दिया।

अपने 900 पन्नों के फैसले में अदालत ने कहा कि कि 11 लोगों पर भारतीय दंड संहिता की धारा-302 के तहत सिर्फ हत्या में ही संलिप्तता साबित नहीं होती, बल्कि धारा-120 बी के अंतर्गत साजिश को अंजाम देने का मामला भी सिद्ध होता है। फांसी की सजा पाए 11 लोगों ने साबरमती एक्सप्रेस को जलाने के लिए साजिश रची और उसे अंजाम देते हुए गाड़ी पर हमला किया, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई।

अदालत ने अन्य 20 आरोपियों को इन साजिशकर्ताओं का साथ देने और ट्रेन पर लगातार पत्थर फेंकने का दोषी माना। इन दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।

अदालत के अनुसार, गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को साजिश रचकर जलाया गया विशेष अदालत के जज पी.आर.पटेल ने अपने निर्णय में कहा कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को पूरी साजिश रचाकर जलाया गया। यह साजिश घटना से एक दिन पहले 26 फरवरी 2002 की रात को अमन गेस्ट हाउस में रचा गया। अमन गेस्ट हाउस में साजिश रचने वालों में अमन गेस्ट हाउस का मालिक रज्जाक कुरकुर सहित चार और लोग शामिल थे। इसमें सलीम पानवाला, फार्रुख बाना, सलीम जर्दा और सलीम बाना शामिल था। इनमें सलीम पानवाला व फार्रुख बाना अभी भी पाकिस्तान में छिपा बैठा है।

जज पी.आर.पटेल के अनुसार, इस साजिश को 27 फरवरी 2002 को अंजाम दिया गया, जब साबरमती एक्सप्रेस को गोधरा स्टेशन के ‘ए’ केबिन के निकट चेन खींच कर रोका गया। गाड़ी के रुकते ही अयूब पटालिया, इरफान कलंदर, महबूब पोपा, शौकत पटालिया और सिदिक बोहरा ने एस-6 और एस-7 कोचों को जोड़ने वाले हिस्से को काटा था।

इसके बाद सभी एस-6 कोच में दाखिल हो गए, जिसमें बड़ी संख्या में विश्व हिंदू परिषद के कारसेवक सवार थे। इन सभी ने बड़ी मात्रा में कोच के अंदर पेट्रोल उड़ेल दिया और आग लगा दी। इस पेट्रोल की खरीद एक रात पहले ही ‘बावा’ पेट्रोल पंप से कर ली गई थी।

सरकारी पक्ष के वकील पंचाल के मुताबिक अदालत ने साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाने की घटना को साजिश करार देने के लिए प्रत्यक्षदर्शी गवाहों व परिस्थितिजन्य साक्ष्य के अलावा वैज्ञानिक साक्ष्य का भी उपयोग किया है। उनके मुताबिक अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच पर करीब 1000 स्थानीय लोगों की भीड़ ने हमला किया था।  

253 गवाहों व 1500 दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने सुनाया फैसला
गोधरा नरसंहार की पूरी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई है। कांग्रेसियों, मानवाधिकारवादियों और और एनजीओ गिरोह गुजरात पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट तक गए, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 में सीबीआई के पूर्व प्रमुख आर के राघवन के नेतृत्व में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया, जिसने इस पूरे मामले की जांच की।

गोधरा मामले की पूरी सुनवाई साबरमती जेल में जून 2009 में शुरू हुई। इस स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन भी गुजरात हाईकोर्ट के निर्देश पर हुआ था। अदालत ने इस जघन्य कांड में 22 फरवरी 2011 को फैसला सुनाया। इस मामले में पूरे ट्रायल के दौरान 253 गवाहों की गवाही हुई और 1500 दस्तावेजी साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

इसके आधार पर 107 लोगों को गोधरा नरसंहार का मुख्य आरोपी बनाया गया, जिसमें से पांच की मौत ट्रायल के दौरान ही हो गई। इसमें आठ नाबालिग किशोर भी शामिल थे, जिनका मामला बाल अदालत में चल रहा है। कुल बचे 94 अभियुक्तों में से 63 सबूतों के अभाव में बरी हो गए और 31 को सजा हुई। इन सजा पाने वाले 31 दोषियों में से 11 को मौत की सजा और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

गोधरा के कथित मास्टरमाइंड जो संदेह का लाभ लेने में कामयाब रहे
विशेष जांच दल ने गोधरा नरसंहार में गोधरा स्थित मस्जिद के मौलाना मौलवी हुसैन उमर जी और कांग्रेस नेता व गोधरा नगरपालिका के अध्यक्ष बिलाल हुसैन कलोटा को इस हमले में मास्टर माइंड करार दिया था। अदालत ने इन दोनों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था।

जांच दल की रिपोर्ट के मुताबिक जिस वक्त हजारों मुसलमान साबरमती एक्सप्रेस को घेर कर उस पर हमला कर रहे थे, उस वक्त मौलाना उमर जी वहां की मस्जिद के लाउडिस्पीकर से हमलावरों को उकसा रहे थे। मस्जिद से ‘मारो-काटो’ की उद्घोषणा लगातार की जा रही थी। घटना के प्रत्यक्षदर्शियों व जिंदा बचे लोगों ने भी अपने एफआईआर में इसका जिक्र किया था कि गोधरा स्टेशन के नजदीक स्थित मस्जिद से लगातार ‘काफिरों को मारो-काटो’ ‘एक भी बचने न पाए’ की उदघोषणा की जा रही थी।

अभियोजन पक्ष का तर्क था कि गिरफ्तार अभियुक्तों के अनुसार साबरमती एक्सप्रेस को जलाने की साजिश रचने और उसे आग के हवाले करने वाले में शामिल सलीम पानवाला और फार्रुख बाना ने उनसे कहा था कि मौलाना उमरजी का यह आदेश है कि बाबरी मस्जिद का बदला लेना है। इसके लिए अयोध्या से साबरमती एक्सप्रेस से लौट रहे कारसेवकों पर हमला करना है। हालांकि जांच दल मौलाना उमरजी की सीधी संलिप्तता के साथ-साथ यह साबित करने में भी नाकाम रहा कि मस्जिद से यह उदघोषणा मौलाना उमर जी ने ही किया था, जिसके कारण उसे संदेह का लाभ देते हुए विशेष अदालत ने बरी कर दिया।  

जांच दल ने जिस दूसरे शख्स को गोधरा नरसंहार का मास्टर माइंड बताया था वह गोधरा नगरपालिका का अध्यक्ष बिलाल हसन कलोटा था। कलोटा गोधरा कांग्रेस का पदाधिकारी और घटना के वक्त नगरपालिका अध्यक्ष था। पेशे से वकील और नगरपालिका अध्यक्ष होने के कारण वह इलाके में काफी दबदबा रखता था। उस पर आरोप था कि साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाने के लिए स्थनीय मुसलमानों की भीड़ को उसी ने इकट्ठा किया था। अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ सबूत इकट्ठा करने में नाकाम रहा, जिसके कारण उसे संदेह का लाभ मिल गया।

वैसे गुजरात हाईकोर्ट के द्वारा गठित नानावती कमीशन ने भी मौलवी हुसैन उमर जी और गोधरा नगरपालिका के अध्यक्ष बिलाल हुसैन कलोटा को इस हमले का मास्टर माइंड करार दिया था, लेकिन अभियोजन पक्ष इन दोनों के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने में कामयाब नहीं हो सका।


रामभक्तों को जलाकर मारने वाले कई जेहादी अभी भी हैं पाकिस्तान में
59 रामभक्तों को जलाकर मारने वाले जेहादी मानसिकता के मुसलमान किसी दूसरे देश से नहीं आए थे, बल्कि इस देश के गुजरात प्रांत के गोधरा के निवासी हैं। घटना को अंजाम देने वाले कई जेहादी आज पाकिस्तान में पनाह लिए हुए हैं, इनमें दो पूर्व कांग्रेसी कार्यकर्ता सलीम पानवाला व फार्रुख बाना भी शामिल हैं। स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले के मुताबिक सलीम हाजी इब्राहिम पानवाला, शौकत अहमद चरखा उर्फ लालू एवं फार्रुख बाना को गोधरा मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। यह तीनों अभी भी फरार हैं।

गोधरा नरसंहार में जांच के दौरान पता चला कि चार अभियुक्त पाकिस्तान में रह रहे हैं। इसमें से एक इब्राहिम दांतिया उर्फ कचूका को 2009 में गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वह ट्रेन के रास्ते पाकिस्तान से भारत लौटा था। हालांकि गुजरात पुलिस व एसआईटी उसके खिलाफ कुछ खास सबूत पेश नहीं कर पाई, जिसके कारण विशेष विशेष अदालत ने संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।

उसी से पता चला कि सलीम हाजी इब्राहिम पानवाला और शौकत अहमद चरखा उर्फ लालू अभी भी पाकिस्तान में रह रहा है। जबकि फार्रुख बाना का कहीं पता नहीं है। इब्राहिम की गिरफ्तारी की खबर के बाद वह पाकिस्तान के करांची से फरार हो गया और इस वक्त किस देश में है इसका पता न तो गुजरात पुलिस को है और न ही देश के इंटेलिजेंश ब्यूरो को। इसी वजह से उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी नहीं किया जा सका है, जबकि सलीम पनवाला व शौकत चरखा के खिलाफ इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया हुआ है। भारत से भागने से पहले इन्हें बड़ी आसानी से दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास से वीजा भी मिल गया था, जो दर्शाता है कि इन्हें भारत से भागने में किस तरह की राजनीतिक मदद मिली थी।

कांग्रेसी कार्यकर्ता को फांसी व उम्रकैद की सजा भी मिली और कुछ पाकिस्तान में भी छिपे हैं, लेकिन क्या कभी इस पर मीडिया में चर्चा देखी या सुनी है?

गोधरा नरसंहार के बाद घटना स्थल का निरीक्षण करने गई जस्टिस तेबतिया कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘‘नगरपालिका का कांग्रेस सदस्य हाजी बिलाल इलाके में ‘बिन लादेन ऑफ गोधरा’ के नाम से जाना जाता है। उसे पुलिस ने गिरफ्तार किया है। वह नगरपालिका के व्हीकल कमेटी का चेरमैन भी है। इसके अलावा इस घटना में जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष फार्रुख बाना और गोधरा नगरपालिका में कांग्रेस पार्टी का सक्रिय सदस्य अब्दुल रहमान दांतिया की संलिप्तता का भी पता चला है। इन तीनों की मौजूदगी यह दर्शाता है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता साबरमती एक्सप्रेस को जलाने में बेहद सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं।’’

59 रामभक्तों को साबरमती एक्सप्रेस में जलाकर मारने की घटना के तत्काल बाद इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने पांच लोगों का नाम प्रकाशित किया था, यह कह कर कि गोधरा कांड में गिरफ्तार ये लोग कांग्रेस के अधिकारी व कार्यकर्ता हैं। हालांकि इसके बाद कांग्रेस के इशारे पर इंडियन एक्सप्रेस सहित सभी अखबारों व इलेक्ट्रोनिक चैनलों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की संलिप्तता व उनके नाम को पूरी तरह से दबा दिया।

5 मार्च 2002 को इंडियन एक्सप्रेस ने गोधरा नरसंहार में लिप्त जिन कांग्रेसी नेताओं के नाम व उनके पद प्रकाशित गए थे, वो हैं-

1.महमूद हुसैन कलोटाः गोधरा नगरपालिका का अध्यक्ष एवं जिला कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का संयोजक
2. सलीम अब्दुल गफ्फार शेखः पंचमहल युवा कांग्रेस अध्यक्ष
3. अब्दुल रहमान अब्दुल माजिद दांतियाः कांग्रेस कार्यकर्ता
4. फार्रुख बानाः जिला कांग्रेस कमेटी का सचिव
5. हाजी बिलालः इलाके का प्रमुख कांग्रेस कार्यकर्ता

अब विशेष अदालत के फैसल पर गौर फरमाइए! अदालती फैसले में जिन 31 दोषियों को सजा सुनाई गई है, उनमें इन पांच कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में से तीन के नाम शामिल हैं। मसलन, हाजी बिलाल को फांसी की सजा सुनाई गई है। वहीं, अब्दुल रहमान दांतिया और फार्रुख बाना को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। जबकि महमूद हुसैन कलोटा को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया है।

इनके अलावा एक और नाम है, जिसे इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित नहीं किया था, वह है सलीम हाजी इब्राहिम पानवाला। भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने 23 जुलाई 2013 को ‘टाइम्स नाउ’ चैनल पर बहस के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा था, ‘‘यह साबित हो गया है कि गुजरात के दंगे कांग्रेस ने कराये थे। अगर आप देखेंगे तो जिन लोगो ने गोधरा में ट्रेन में हिंदुओं को जिंदा जलाया था, उनमें से एक सलीम हाजी पनवाला कांग्रेस पार्टी का प्रमुख कार्यकर्ता रहा है।’’

कांग्रेस पार्टी ने इसका खंडन नहीं किया, बल्कि वह और उसके बाद सारी मीडिया पूरे मामले पर चुप्पी लगा गई। अगर यह खबर झूठी होती तो अभी तक कांग्रेस उनको मानहानि का नोटिस थमा चुकी होती, लेकिन कांग्रेस पार्टी जानती है कि यदि नोटिस थमाया तो केवल एक सलीम पानवाला नहीं, बल्कि गोधरा सहित गुजरात दंगे में शामिल और अदालत से सजा पाए करीब 25 कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की सूची बाहर आ जाएगी!

कांग्रेसी कार्यकर्ता हाजी बिलाल गोधरा का ‘बिन लादेन’ था!
रामभक्तों को जलाकर मारने में फांसी की सजा पाने वाले हाजी बिलाल को ‘गोधरा का बिन लादेन’ कहा जाता था। रिपोर्ट के मुताबिक साबरमती एक्सप्रेस पर हमलावर स्थानीय मुसलमानों की भीड़ ‘हिंदुओं को मारो-काटो’ के साथ-साथ ‘लादेन ना दुश्मनों को मारो’ का नारा भी लगा रही थी। यह ‘लादेन’ तालिबान का पूर्व सरगना ओसामा बिन-लादेन नहीं, बल्कि हाजी बिलाल था!
जस्टिस तेबतिया कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘‘हाजी बिलाल गोधरा में नगरपालिका का कांग्रेसी सदस्य और व्हिकल कमेटी का चेयरमैन था। घटना को अंजाम देने से कुछ रात पहले वह गोधरा के फायर स्टेशन का निरीक्षण करने भी गया था।’’

हाजी बिलाल पूर्व जिला कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के संयोजक व गोधरा नगरपालिका अध्यक्ष महमूद हुसैन कलोटा का दायां हाथ था। नगरपालिका का चुनाव जीतने से पहले महमूद हुसैन कलोटा कई वर्षों तक कांग्रेस के गोधरा जिला अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का संयोजक रहा था। 43 वर्षीय हाजी बिलाल का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है। कलोटा के समर्थन से ही वह नगरपालिका का सदस्य बना था।

हाजी बिलाल ने रेलगाड़ी में पॉकेटमारी से अपने आपराधिक करियर की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे रेलवे स्टेशन व स्टेशन यार्ड पर उसने आपराधिक कब्जा स्थापित कर लिया। पॉकेटमारी व यात्रियों के सामानों की चोरी के गिरोह को चलाने के अलावा जुएबाजी, सट्टेबाजी व पार्सल के माल की चोरी में भी वह लिप्त था। यही नहीं, मुंबई-दिल्ली रेलवे लाइन, बड़ौदा, आनंद आदि जाने वाली रेलगाडि़यों में भीख मांगने वाले भिखारियों का उसने बड़ा गिरोह खड़ा कर लिया। अपने बढ़ते कुकृत्यों के कारण वह स्थानीय माफियाओं व राजनीतिज्ञों के संपर्क में आया। स्थानीय माफिया यूसुफ गोधरावाला के जरिए वह अहमदाबाद के डॉन अब्दुल लतीफ के संपर्क में आया और उसका दायां हाथ बन गया।

पुलिस के दबाव से घबरा कर अब्दुल लतीफ भागकर पाकिस्तान के करांची में जा छुपा था। हाजी बिलाल ने लतीफ के कहने पर उसकी दूसरी पत्नी मेहरुन्निसा और साले अब्दुल रऊफ को नकली पासपोर्ट के सहारे उसके पास करांची भेजने में मदद की थी। 1997 में भारत आने पर लतीफ पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था। लतीफ के मरने पर उसने हुसैन दांतिया का साथ पकड़ा। दांतिया अंडरवल्र्ड डॉन दाउद इब्राहिम के लिए जूए का कारोबार संचालित करता था।

अपराध में दबदबा स्थापित करने के बाद उसने ‘पॉवर’ के लिए राजनीति का रास्ता पकड़ा। कांग्रेस के गोधरा जिला अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के संयोजक महमूद हुसैन कलोटा के जरिए पहले वह कांग्रेस का कार्यकर्ता बना और फिर नगरपालिका का सदस्य बन गया। कहते हैं, गुजरात ही नहीं, दिल्ली के कई बड़े कांग्रेसी नेताओं तक उसने सीधी पहुंच बना ली थी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यही हाजी बिलाल गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के यात्रियों पर न केवल हमले को निर्देशित व संचालित कर रहा था, बल्कि अग्निशमन गाडि़यों को भी उसने ही स्टेशन के अंदर आने से रोक दिया था, जिसके कारण हिंदुओं को जल कर मरने से बचाया नहीं जा सका।

गोधरा में हिंदू नरसंहार को अंजाम देने के बाद गाड़ी बदलते हुए पहले मोटरसाइकिल और बाद में टाटा सुमो से वह गुजरात से बाहर निकल कर मध्यप्रदेश के इंदौर और फिर मुंबई भाग निकला। उसकी योजना भागकर पाकिस्तान के करांची पहुंचने की थी। करांची भागने से पहले ही वह गुजरात पुलिस के हत्थे चढ़ गया।

विशेष अदालत ने गोधरा नरसंहार में उसके अपराध को बेहद संगीन मानकर उसे फांसी की सजा सुनाई है। हाजी बिलाल उस कांग्रेस का चेहरा है, जो खुद को तो धर्मनिरपेक्षता का झंडबदार बताती है, लेकिन जिसकी संलिप्तता भारतीय इतिहास के हर सांप्रदायिक दंगे में परिलक्षित होती रही है!

स्थानीय मुसलमानों ने किया था हिंदुओं पर हमला!
गोधरा नरसंहार में 59 हिंदू जिंदा जलाकर मारे गए, लेकिन आज देश में उसकी चर्चा करने वाला न कोई मीडिया है, न कोई एनजीओ है और न ही कोई मानवाधिकारवादी संगठन! जबकि गुजरात हाईकोर्ट द्वारा गठित नानावती कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि साबरमती एक्सप्रेस जलाने की घटना को पूरी साजिश के तहत अंजाम दिया गया।

कुछ स्थानीय मुसलमानों ने 26 फरवरी की रात को अमन गेस्ट हाउस में इस साजिश को रचा। निकट के पेट्रोल पंप से 140 लीटर पेट्रोल खरीदकर जमा किया गया, जिसे अगले दिन साबरमती एक्सप्रेस को जलाने के लिए उपयोग में लाया गया। 27 फरवरी 2002 की सुबह मुसलमानों की भीड़ ने ट्रेन पर हमला कर दिया। रिपोर्ट कहती है कि भीड़ में 1000 से अधिक मुसलमान शामिल थे और भीड़ नारे लगा रही थी, ‘गाड़ी में आग लगा दो, हिंदुओं को मारो।’

कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि स्टेशन के नजदीक स्थित मस्जिद से लाउडिस्पीकर से ‘हिंदुओं को मार डालो’ कहकर उकसाया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक गाड़ी के बाहर खड़ी मुसलमानों की भीड़ पत्थर बरसा रही थी, जिस कारण एस-6 बोगी से यात्री बाहर नहीं निकल सके और अधिकतम मौतें हुई।

गोधरा मामले में सांप्रदायिकता की राह पर चली भारतीय मीडिया!
गोधरा के बाद भडके दंगे में मुसलमान पीडि़तों के परिवार को पिछले 10 सालों से दिखाती आ रही भारतीय मीडिया ने न तो सितंबर 2008 (नानावती कमीशन की रिपोर्ट जमा करने की तारीख) को और न ही 25 फरवरी 2011 (विशेष अदालत के निर्णय की तारीख) को ही साबरमती एक्सप्रेस में जल कर मरे हिंदुओं के परिवार के दर्द को आम जनता से बांटा! गुजरात हाईकोर्ट द्वारा गठित नानावती कमीशन व विशेष अदालत द्वारा साजिश की अवधारणा की पुष्टि होने के बावजूद मीडिया कुछ वामपंथी व सांप्रदायिक विचारकों के जरिए इसे झुठलाने में लगी रही!

अदालती फैसले वाले दिन देश के सभी इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बहस का मुद्दा यह नहीं था कि 31 लोगों को सजा हुई, बल्कि यह था कि फैसले से बरी हुए 63 लोगों को आठ सालों तक जेल में बंद रखा गया, जिससे उनका सामाजिक व पारिवारिक जीवन प्रभावित हुआ! मस्जिद के मौलाना उमरजी के परिवार का दर्द आम जनता को बताया और दिखाया जाता रहा कि देखिए इस मौलवी को आठ साल तक जेल में रहना पड़ा!

इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू जैसे अंग्रेजी अखबारों ने यह कभी नहीं लिखा कि राम भक्त या हिंदू मारे गए, बल्कि यह लिखा कि विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कारसेवक मारे गए। वहीं, जब भी गुजरात दंगों की बात होती है तो मरने वालों के लिए ‘मुसलमान’ शब्द का जिक्र होता है जबकि उसमें 250 से अधिक हिंदू भी मरे थे! कभी भी, किसी भी मीडिया में गोधरा नरसंहार के शिकार हुए 59 रामभक्तों के परिवार के दुख-दर्द को पर्याप्त जगह नहीं मिली!

एक उदाहरण से समझाता हूं। अदालती फैसले के बाद 1 मार्च 2011 को इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा, ‘‘साबरमती एक्सप्रेस में जो कारसेवक जलाए गए उसमें से अधिकांश विश्व हिंदू परिषद के सदस्य थे।’’ जबकि उसी रिपोर्ट में अखबार आगे लिखता है ‘‘गोधरा के बाद भड़के दंगे में करीब 1200 लोग मरे, जिसमें से अधिकांश मुसलमान थे।’’ इसी से भारतीय मीडिया की सांप्रदायिक सोच का पता चलता है! इसी का नतीजा है कि बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे विदेशी मीडिया ने भारत को मुसलमानों के लिए सबसे असुरक्षित जगह तक बताने में देर नहीं की!

हिंदुओं की मौत पर यूपीए सरकार द्वारा पर्दा डालने की कोशिश!
गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के करीब ढ़ाई साल बाद कांग्रेस संचालित यूपीए-1 के रेलमंत्री और ‘चैंपियन ऑफ सेक्यूलरिज्म’ लालू प्रसाद यादव ने सितंबर 2004 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश उमेशचंद्र बनर्जी को इस मामले की जांच का जिम्मा सौंप दिया। बनर्जी कमेटी के गठन का मकसद राजनैतिक था और यह साबित करना था कि ट्रेन पर मुसलमानों ने हमला नहीं किया, बल्कि ट्रेन के अंदर से ही आग लगी, जिसमें कारसेवक जल मरे। लालू के इस राजनैतिक जांच में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित पूरी यूपीए सरकार की सहमति थी!

लालू यादव की धर्मनिरपेक्षता की पोल तत्काल खुल भी गई! उस समय बिहार में चुनाव था और लालू ने अपने ‘माई’ (मुस्लिम-यादव गठजोड़) समीकरण को साधने के लिए इस रिपोर्ट का तत्काल राजनैतिक उपयोग भी कर लिया। बनर्जी कमेटी ने जनवरी 2005 में बिहार चुनाव से केवल दो दिन पहले यह रिपोर्ट दे दिया कि साबरमती एक्सप्रेस में बाहर से आग नहीं लगाई गई थी, बल्कि गाड़ी के अंदर से ही आग लगी थी और यह महज एक दुर्घटना भर थी! बनर्जी कमेटी, कांग्रेस चालित यूपीए सरकार व उसके रेलमंत्री लालू यादव का मतलब स्पष्ट था कि साबरमती एक्सप्रेस पर गोधरा के मुसलमानों ने हमला नहीं किया था, बल्कि रामभक्तों ने रेल के डिब्बे में खुद ही आग लगा ली और सामूहिक आत्मदाह कर लिया!

हिंदुओं के प्रति नृशंसता दर्शाती बनर्जी कमेटी की रिपोर्ट को साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड में घायल हुए नीलकंठ तुलसीदास भाटिया ने अदालत में चुनौती दी। अक्टूबर 2006 को गुजरात हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘बनर्जी कमेटी’ पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक है। इसका गठन जानबूझ कर एक खास मकसद से किया गया प्रतीत होता है। प्राथमिक दृष्टि में इस कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज किया जाता है।

आखिर गोधरा में हुआ क्या था? एक पीडि़ता की जुबानी दर्दनाक कहानी
साबरमती एक्सप्रेस में हुए हिंदुओं के नरसंहार की खबर जब अखबार में छपी तो उसमें एक किशोरी के बयान ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। 16 साल की छात्रा गायत्री पंचाल उस वक्त 11 वीं कक्षा में पढ़ती थी। वह अपने परिवार के साथ अयोध्या से घर अहमदाबाद लौट रही थी। एस-6 बोगी में उसकी मां नीताबेन, उसके पिता हर्षद भाई पंचाल, उसकी दो बहनें प्रतीक्षा और छाया सहित 10 लोग उसकी आंखों के सामने जिंदा जलकर मर गए। वह अपने परिवार में अकेली बची थी।

उस वक्त के उसके बयान के मुताबिक ‘‘27 की सुबह करीब 8 बजे गाड़ी गोधरा स्टेशन से आगे बढ़ी। गाड़ी में सवार सभी कार सेवक ‘राम धुन’ गा रहे थे। गाड़ी मुश्किल से 500 मीटर गई होगी कि अचानक रुक गई। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, पटरी के दोनों ओर से बड़ी संख्या में लोग हाथ में तलवार, गुफ्ती आदि लेकर गाड़ी की ओर भागे आ रहे थे। वे लोग गाड़ी पर पत्थर बरसा रहे थे। गाड़ी के अंदर मौजूद सभी लोग डर गए और डर कर खिड़की दरवाजा बंद करने लगे।’’

‘‘बाहर के लोगों की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी। वे लोग कह रहे थे, ‘मारो-काटो’, ‘लादेन ना दुश्मनों ने मारो’ और भीड़ ने ट्रेन पर हमला कर दिया। हमलावरों ने खिड़की को तोड़ दिया और बाहर से गाड़ी का दरवाजा बंद कर दिया ताकि कोई भाग न सके। उसके बाद उन्होंने गाड़ी के अंदर पेट्रोल उड़ेल कर आग लगा दी। बोगी के अंदर घुसे हमलावर कारसेवकों को मार और लूट रहे थे। कम्पार्टनमेंट में हर ओर पेट्रोल और आग पसरता जा रहा था। हमलोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे, लेकिन वहां कौन हमारी मदद को आता?’’

‘‘हमने देखा कि कुछ पुलिस वाले कारसेवकों को बचाने के लिए बोगी में घुसने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भीड़ ने उन्हें बाहर ही पकड़ लिया। ट्रेन के डिब्बे में हर ओर धुआं ही धुआं भर गया, जिसके कारण किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हमारा दम घुटने लगा था। मैं किसी तरह टूटी हुई खिड़की से कूद गई। बाहर खड़े लोग हमें पकड़ने के लिए दौड़े और डर के मारे हम फिर से जलती हुई ट्रेन की ओर भागे और केबिन तक पहुंचने में सफल रहे। अंदर मैंने अपनी आंखों के सामने अपने माता-पिता और बहनों को जिंदा जलते देखा। हम किसी तरह स्टेशन तक पहुंचने में सफल रहे जहां मैं अपनी मौसी से मिली। गाड़ी की बोगी पूरी तरह से जल चुकी थी। भीड़ चिल्ला रही थी थी। उस भीड़ में न केवल पुरुष थे, बल्कि महिलाएं और हमारी उम्र के किशोर भी शामिल थे। हम 18 लोग थे, जिसमें से 10 जिंदा जल कर मर गए।’’

गोधरा की घटना के बाद जिस गायत्री का बयान मीडिया ने लिया, उसी गायत्री की मीडिया ने आज तक दोबारा से खबर नहीं ली है! उस गायत्री के लिए कोई तीस्ता शीतलवाड़, कोई अरुंधति राय, कोई जावेद अख्तर, कोई शबाना आजमी या किसी महेश भट्ट ने कभी कोई आवाज नहीं उठाई है? हां, लेकिन हर बार चुनाव के समय गुजरात दंगे के शिकार कुछ परिवारों को बार-बार तीस्ता-शबनम-जावेद-शबाना के बयान की चासनी में लपेटकर मीडिया दिखाती भी है और छापती भी है!

हिंदुओं के नरसंहार के लिए आखिर गोधरा को ही क्यों चुना गया?
सवाल उठता है कि मुसलमानों ने हिंदुओं के नरसंहार के लिए गोधरा को ही क्यों चुना। दरअसल गोधरा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास रहा है। यहां देश विभाजन के समय 1947 में जबरदस्त दंगा भड़का था। उसके बाद से यहां 1952, 1959, 1961, 1965, 1967, 1972, 1974, 1980, 1983, 1989, 1990 और 1992 में दंगा भड़क चुका है।

यहां घांची मुसलमानों की बड़ी तादाद है, जो धार्मिक दृष्टि से बेहद कट्टर और जेहादी मानसिकता के हैं। जस्टिस तेबतिया कमेटी अपनी रिपोर्ट में लिखती है, गोधरा में मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर देश में उनकी वृद्धि दर से कहीं अधिक है। आंकड़े दर्शाते हैं कि यहां हिंदू-मुस्लिम का जनसंख्या का अनुपात 48ः52 है।

यहां के मुसलमान आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, जिसके कारण यहां के हर दूसरे-तीसरे घर से कोई न कोई व्यक्ति अरब, अमीरात और अन्य मुस्लिम देशों में कमाने के लिए जाता है और जब वहां से लौटता है तो उसकी मजहबी कट्टरता की खुराक में वृद्धि स्पष्ट दिखती है!  

आतंकवाद नहीं, जेहाद की परिणति थी गोधरा!
गोधरा की घटना ने इस देश के पूरे मानस को ही बदल दिया। आजादी मिलने के समय से ही बार-बार संप्रदायिकता और आतंकवाद की मार झेलता यह देश, पहली बार ‘इस्लामी जेहाद’ की आग में झुलसा था। गोधरा का हमलावर कोई प्रशिक्षित आतंकवादी नहीं था! उसने ट्रेन को बम धमाके से नहीं उड़ाया था! न ही वह हाथ में एके-47 लेकर ट्रेन में घुसा और लोगों पर अंधाधुंध गोलियों की बौछार की! यह सांप्रदायिक घटना भी नहीं थी, जिसमें आवेश या गुस्से में आकर पड़ोसी ही पड़ोसी पर तलवार, चाकू, सरिया, बंदूक, जलती मशाल या ऐसे ही किसी हथियार को लेकर टूट पड़ता है। सांप्रदायिकता में दोनों समुदायों का नुकसान तय है!

हिंदुओं व काफिरों को मारने का नारा दिया जा रहा थाः गोधरा की घटना विशुद्ध रूप से जेहाद था, जिसमें सोच समझ कर साजिश रचकर ‘हिंदुओं और काफिरों को मार डालो’ का नारा बुलंद किया जा रहा था। इस जेहाद में गोधरा के केवल मुसलमान पुरुष ही नहीं, बल्कि मुस्लिम महिलाएं, बच्चे और किशोर भी शामिल थे। हिंदुस्तान में पहली बार खुले तौर पर किसी मस्जिद से ‘मार डालो-काट डालो’ का अजान दिया जा रहा था। पहली बार इसमें एक दुकानदार से लेकर सरकारी अधिकारी तक और नगर पार्षद से लेकर राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता व आम मुसलमान तक शामिल थे।

महिलाएं और छोटे बच्चे तक शामिल थे इस जेहाद मेंः गोधरा नरसंहार में मस्जिद का एक बुजुर्ग मौलवी से लेकर, नगर पार्षद, गेस्ट हाउस का मालिक, नेता, वेंडर, किशोर, सभी को अभियुक्त बनाया गया... मतलब गोधरा का हर तबका इस नरसंहार में शामिल था। सबसे भयानक बात तो नानावती कमीशन की रिपोर्ट में आई है। कमीशन ने अग्निशमन अधिकारियों का बयान दर्ज किया है। फायर बिग्रेड के कर्मचारियों के मुताबिक, ‘‘जब हमें सुचना मिली कि साबरमती एक्सप्रेस जलाई गयी है तो हम तुरंत आग पर काबू पाने के लिए चल पड़े, लेकिन सिग्लन फालिया के पास बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं और बच्चे दमकल गाड़ी के सामने लेट गये। वो चिल्ला रहे थे, इनको तब तक मत जाने दो जब तक कि ट्रेन पूरी तरह जल न जाये!’’ यानी महिलाएं और बच्चे भी पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर जेहाद का नारा बुलंद कर रहे थे!

सेना का अधिकारी तक जेहादी मुसलमान बन गया थाः जस्टिस नानावती कमीशन ने इसमें सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के बर्खास्त अधिकारी नानूमियां का जिक्र किया है, जो दंगाई मुसलमानों की भीड़ को उकसा रहा था। मतलब सेना का अधिकारी भी जेहादी हो गया था!

सरकारी अधिकारियों के लिए भी यह जेहाद ही थाः गोधरा का असिस्टेंट कलेक्टर पूर्वी उप्र का मूल निवासी एक युवा मुसलमान था। 27 फरवरी 2002 यानी घटना वाले दिन से दो दिन पहले वह छुट्टी पर चला गया था और मार्च महीने के मध्य तक वापस ड्यूटी पर नहीं लौटा जबकि उसका जिला संप्रदायिकता की आग में झुलस रहा था। मतलब जिला के एक वरिष्ठ मुस्लिम अधिकारी को दो दिन पहले से पता था कि साबरमती एक्सप्रेस जलाया जाना है! यानी इस इस्लामी जेहाद में एक उच्च स्तर का पढ़ा-लिखा सरकारी अधिकारी भी शामिल था!

दूसरा सरकारी अधिकारी एक सैय्यद मुसलमान रेलवे कर्मचारी था, जिसने दूसरी बार आउटर सिग्नल पर ट्रेन को रोका। चेन खींचने के बाद गाड़ी थोड़ी आगे खिसकी, लेकिन उस प्वाइंटमैन ने उसे दोबारा रोक दिया। मतलब वह भी इस जेहाद का हिस्सा था!

स्थानीय मुसलमानों की पूरी सहमति थी इस जेहाद मेंः गोधरा व उसके बाद भड़के दंगे का जायजा लेने पहुंची जस्टिस तेबतिया कमेटी ने गोधरा की घटना का जो समाजशास्त्रीय विवेचन किया है, वह दर्शाता है कि यह कोई आम सांप्रदायिक या आतंकी हमला नहीं, बल्कि इसमें गोधरा का अधिकांश मुसलमान शामिल था या उसे इसकी पूरी जानकारी थी!

कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेन में सवार सभी स्थानीय मुसलमान यात्री गोधरा स्टेशन से पहले दाहोद रेलवे स्टेशन पर ही उतर गए थे। जब गाड़ी गोधरा में पहुंची तो उसमें एक भी मुसलमान यात्री सवार नहीं था, जो यह दर्शाता है कि स्थानीय मुसलमानों को इस पूरी घटना की जानकारी पहले से ही थी और उन्हें इस गाड़ी में सफर न करने या गोधरा से पहले उतर जाने की नसीहत दे दी गई थी!

दूसरी बात, साबरमती एक्सप्रेस को एक हजार से दो हजार मुसलमानों की भीड़ ने घेर लिया था। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि धूं-धूं कर जलती एस-6 बोगी से जान बचाने के लिए भागने वाले एक भी व्यक्ति को बाहर खडी मुसलमानों की भीड़ बाहर नहीं आने दे रही थी। उन्हें जल कर मरने के लिए अंदर ढकेल दिया जा रहा था। उन पर पेट्रोल फेंका जा रहा था। अगले दिन केवल 35 लोगों की ही गिरफ्तारी हुई, जो यह दर्शाता है कि दोषियों को बचाने के मामले में स्थानीय मुसलमान सामूहिक रूप से सहमत थे!

काफिरों के खिलाफ इस जेहाद में गोधरा के मुसलमानों को कश्मीर, पाकिस्तान, बंग्लादेश व अफगानिस्तान तक के मुसलमानों का समर्थन मिला

नानावती कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक घटना की एक रात पहले अमन गेस्ट हाउस में जब साबरमती एक्सप्रेस को जलाने की योजना बन रही थी तो वहां दो कश्मीरी गुलामनबी और अली मोहम्मद भी मौजूद थे और कश्मीर की आजादी के लिए इसे जरूरी बता रहे थे। (जेहाद का कश्मीरी लिंक)

जस्टिस तेबतिया कमेटी की रिपोर्ट कहती है, गोधरा कांड का एक मकसद भारत में हिंदू-मुसलमान दंगों को हवा देना था ताकि बंग्लादेश को अपने देश में रह रहे हिंदुओं के पूर्ण सफाए का मौका मिल जाए। (जेहाद का बंग्लादेशी लिंक)

इस नरसंहार में पाकिस्तान का लिंक तो ट्रेन जलाकर फरार हुए आरोपी सलीम पानवाला व फार्रुख बाना की आज तक करांची में मौजूदी से ही स्पष्ट हो जाता है। इसके अलावा गुजरात पुलिस की जांच में यह सामने आया था कि 27 फरवरी 2002 से पहले गोधरा से करांची के बीच टेलीफोन कॉल का घनत्व बहुत अधिक बढ़ गया था। करांची से आईएसआई का कमांडर लगातार गोधरा के जेहादी मुसलमानों के संपर्क में था। आतंकियों से सहानुभूति रखने वाले मुसलमानों का वोट पाने के लिए कांग्रेस नेता शकील अहमद जिस आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदी को गुजरात दंगे का परिणाम बताते हैं, उसी के संस्थापक यासीन भटकल ने गिरफ्तारी के बाद बताया है कि करांची से ही इंडियन मुजाहिदीन को ऑपरेट किया जा रहा है। (जेहाद का पाकिस्तानी लिंक)

अफगानिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एक टेलीविजन के साक्षात्कार में कहा था ‘‘भारत के साथ हमारे रिश्ते इस बात पर निर्भर करते हैं कि भारत अपने यहां अल्पसंख्यक मुसलमानों के साथ कैसा सुलूक करता है!’’ और संयोग देखिए कि जिस दिन गोधरा में ट्रेन को जलाने की घटना हुई उस दिन अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री दिल्ली में ही थे! तो क्या यह सिर्फ महज संयोग था?...या फिर गोधरा के घटना की जानकारी उन्हें पहले से थी और वह यहां यह देखने आए थे कि इसकी प्रतिक्रिया में देश के अल्पसंख्यक मुसलमानों के साथ भारत कैसा सुलूक करता है! (जेहाद का अफगानी लिंक)

निष्कर्षः
इतने सारे सबूत यह शक तो पैदा करते ही हैं कि अफगानिस्तान से लेकर बंग्लादेश तक...और कश्मीर से लेकर गोधरा तक अंदर ही अंदर एक सुर में ‘इस्लामी जेहाद’ का नारा बुलंद किया जा रहा था, जिसके शिकार के लिए साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 बोगी में हिंदू-अयोध्या-रामभक्त-कारसेवक जैसे 59 काफिर एक साथ मिल गए! ...और इसके बाद कलम-कैमरे-जुबान-संस्थान वाले मुल्ला-मौलवी (पत्रकार-बुद्धिजीवी-मानवाधिकारवादी-एनजीओ) उन जल कर मरे काफिरों के वजूद को इतिहास के पन्नों से मिटाने के लिए सामूहिक रूप से गुजरात दंगे का आर्तनाद करने लगे!

और हां! इस सबमें यदि सबसे अधिक किसी का फायदा हुआ तो वह हाजी बिलाल की पार्टी कांग्रेस को हुआ! नब्बे के दशक में टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर चुकी कांग्रेस पार्टी ने ‘सेक्यूलरिज्म’ का नारा बुलंद किया और घटना के दो साल बाद ही केंद्र की सत्ता में लौट आई। तो क्या राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय सहभागिता वाला ‘गोधरा नरसंहार’ भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को नेपथ्य में धकेलने और कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लाने के लिए खेला गया एक ‘जेहादी खेल’ था?

साभार: इस लेखक की पुस्‍तक '' निशाने पर नरेंद्र मोदी: साजिश की कहानी-तथ्‍यों की जुबानी'' का पूरा पहला अध्‍याय

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Web Title:  Godhra The Burning Train-The fact behind Fire in Sabarmati Express

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