मैंने इरोम शर्मिला को नहीं देखा!

मैंने इरोम को नहीं देखा। मैंने देखी है एक तस्वीर। उलझे बाल और नाक में पाइप। फूली हुई आंखें, लेकिन चेहरे पर एक अजीबोगरीब दृढ़ता मानो हिमालय टकराए तो चूर-चूर हो जाए। एक और तस्वीर जो जेहन में बार-बार उभरती है, जब कभी उत्तर पूर्व के बारे में सोचता हूं तो कई निर्वस्त्र औरतें विरोध करतीं नजर आती हैं। वे सुरक्षा बलों के अत्याचारों का विरोध कर रही थीं। कोई औरत किसी मुद्दे के लिए अपने कपड़े उतार दे, ऐसा न पहले देखा था और न ही सुना था।

अखबारों की रद्दी में कहीं दब गई है वह तस्वीर भी वैसे ही, जैसे राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप में दब जाते हैं असल मुद्दे। असल लोग, आम आदमी और उसका असल विरोध। रह जाते हैं बयान। पश्चाताप और इधर-उधर बिखरे कुछ पन्ने जो हर साल पढ़े जाते हैं, याद किए जाते हैं, इन पर ब्लॉग लिखे जाते हैं और कोई टटपुंजिया नारा दिया जाता है कि इरोम तुम संघर्ष करो। इरोम के साथ संघर्ष करने की जरूरत किसी को नहीं है। इरोम अकेले काफी हैं। 12 साल से वह लगातार संघर्ष कर रही है। सरकार कहती है कि वह शर्मिदा है।

एक इंटरव्यू में पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै ने यही कहा था कि इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिदगी का कारण है। बात सही है। शर्मिदा सरकारें कदम नहीं उठातीं। अपनी शर्मिदगी के बोझ में लोगों को मरने के लिए छोड़ देती हैं। इरोम शर्मिला ने 12 साल पहले आज के ही दिन यह संघर्ष शुरू किया था। हो सकता है कि 2024 में भी कोई लिखे कि ठीक 24 साल पहले इरोम ने इसी दिन संघर्ष शुरू किया था। मैं इरोम जैसे लोगों से डरता हूं। उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा और हिम्मत से डरता हूं। पता नहीं हमारी सरकार क्यों नहीं डरती है।

सरकार को शर्मिदा होने की बजाय उनसे डरना चाहिए। कहीं देश के और लोग भी इरोम शर्मिला न हो जाएं। लिखते-लिखते याद आया अतुल्य भारत (इन्क्रेडिबल इंडिया) के प्रचार में पूर्वोत्तर छाया रहता है, लेकिन पता नहीं इस अतुल्य भारत में इरोम की जगह है या नहीं।

साभार: बीबीसी ब्लॉग में सुशील झा

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